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संपादकीय: किसान का हित

विधेयकों को लेकर राज्यसभा में जिस तरह के हालात पैदा हुए, उससे यह सवाल उठा कि अगर सरकार इन विधेयकों को किसानों के हित में बता रही है, तो इस पर उठने वाली आपत्तियों का वह कोई संतोषजनक जवाब क्यों नहीं दे रही है!

farmer protest, farmer protest in haryana, farmer protest todayतीन किसान बिलों को लेकर पंजाब के पटियाला में विभिन्न कृषि संगठनों से जुड़े अन्नदाता केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए। (फाइल फोटोः PTI)

राज्यसभा में कृषि विधेयकों के पारित होने के बाद किसान संगठनों और विपक्ष की ओर से इससे संबंधित आपत्तियां सामने आ रही हैं, लेकिन सरकार का साफ कहना है कि ये कानून किसानों के हित में हैं। सवाल है कि इन कानूनों पर अमल के बाद के हालात को लेकर किसानों के भीतर जिस तरह की आशंकाएं खड़ी हुई हैं, क्या उसका कोई सपाट जवाब हो सकता है! अगर सरकार को लगता है कि इन कानूनों के सहारे देश के किसानों की स्थिति में सुधार किया जा सकेगा या उनकी मदद हो सकेगी, तो इससे संबंधित अध्यादेश जारी किए जाने के बाद से लेकर अब तक उसकी ओर से इस मसले पर क्या किया गया कि किसानों के बीच इस बात को लेकर आश्वस्ति होती कि सरकार उनके हित में ये कानून ला रही है!

आखिर किसान इन कानूनों को अपने खिलाफ और उनके भविष्य को बुरी तरह प्रभावित करने वाला क्यों मान रहे हैं? जाहिर है कि सरकार भले ही इस मसले पर आशंकाओं को निराधार बता रही हो, लेकिन किसान इन कानूनों का जिन आधारों पर विरोध कर रहे हैं, उन्हें एकदम से खारिज करना भी उचित नहीं है!

दरअसल, इन विधेयकों को लेकर राज्यसभा में जिस तरह के हालात पैदा हुए, उससे यह सवाल उठा कि अगर सरकार इन विधेयकों को किसानों के हित में बता रही है, तो इस पर उठने वाली आपत्तियों का वह कोई संतोषजनक जवाब क्यों नहीं दे रही है! अब नए कानूनी प्रावधानों के सहारे मंडियों से बाहर अनाज बेचने की सुविधा के नाम पर प्रतिस्पर्धी व्यापार माध्यमों से लाभकारी मूल्य उपलब्ध कराने की बात की जा रही है। लेकिन किसानों का मानना है कि व्यवहार में इससे ऐसी व्यवस्था बनेगी, जिसमें आखिरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य आधारित खरीद प्रणाली का अंत हो सकता है और निजी कंपनियों द्वारा शोषण बढ़ सकता है।

सरकार का यह भी दावा है कि किसान अनुबंध विधेयक के जरिए आधुनिक तकनीक और बेहतर इनपुट तक किसानों की पहुंच सुनिश्चत कर विपणन लागत कम करके आय या मुनाफे को बढ़ाया जाएगा। लेकिन इस कानून के लागू होने के बाद किसानों की मोल-तोल करने की शक्ति के कमजोर होने के साथ-साथ जब बड़ी निजी कंपनियों, निर्यातकों, थोक विक्रेताओं और उद्योगपतियों को बढ़त मिलने की स्थितियां बनेंगी, वैसी स्थिति में किसानों के सामने क्या विकल्प रहेगा! इसके अलावा, भंडारण पर रोक हटाने संबंधी नई व्यवस्था के बाद छोटे किसानों की दिक्कतें और कई जरूरी फसलों की बाजार में कीमतों को लेकर गंभीर आशंकाएं खड़ी हुई हैं।

हालांकि सरकार इस मसले पर अब भी कह रही है कि इन कानूनों से न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था पर कोई असर नहीं पड़ेगा, मगर सवाल है कि आने वाले दिनों में व्यवहार में जो हालात बनेंगे, उसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य को उसके मूल रूप में कैसे बचाए रखा जा सकेगा! फिलहाल हालत यह है कि सरकार के पास आत्महत्या करने वालों से लेकर बुरी दशा में पहुंच चुके किसानों से संबंधित कोई आंकड़ा तैयार करने की कोई व्यवस्था प्रभावी नहीं दिख रही है।

ऐसी स्थिति में अगर सरकार इन कानूनों के जरिए किसानों के हित का दावा कर रही है, तो उसे उनकी आपत्तियों पर भी गौर करना चाहिए। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि कृषि क्षेत्र का जीडीपी में जो योगदान रहा है, उसके बूते ही कई मौकों पर आर्थिक संकट के दौरान देश को उबरने में मदद मिली है। अगर सरकार नई व्यवस्था बनाने की ओर बढ़ रही है, तो उसे सब कुछ निजी क्षेत्र या बड़े कारोबारियों के भरोसे छोड़ने के बजाय कृषि, किसानों और आर्थिक क्षेत्र के पारस्परिक हितों को सुनिश्चित करना चाहिए।

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