हंगामे की एकता

संसद में मानसून सत्र के दो हफ्ते हंगामे की भेंट चढ़ गए। अब भी विपक्ष का रुख कुछ नरम नहीं दिख रहा।

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सांकेतिक फोटो।

संसद में मानसून सत्र के दो हफ्ते हंगामे की भेंट चढ़ गए। अब भी विपक्ष का रुख कुछ नरम नहीं दिख रहा। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने विपक्षी नेताओं को नाश्ते पर बुलाया। एक-दो को छोड़ कर सभी गए। वहां संसद में विरोध की रणनीति बनी और सारे नेता वहां से साइकिल चला कर संसद पहुंचे। फिर वही हंगामा हुआ। विपक्ष पेगासस जासूसी मामले में जांच की मांग पर अड़ा है। सरकार जांच को तैयार नहीं है। और भी कई मुद्दे हैं, जिन पर चर्चा प्रस्तावित है, मगर इस हंगामे की वजह से किसी विषय पर कोई सार्थक बहस नहीं हो पा रही।

हालांकि प्रधानमंत्री ने सत्र के पहले दिन ही कह दिया था कि सरकार हर सवाल का जवाब देने को तैयार है। संसद को सुचारु रूप से चलने दिया जाना चाहिए। उन्होंने सर्वदलीय बैठक बुला कर भी संसद की कार्यवाही बिना बाधा के चलाने पर सहमति लेनी चाही थी। पर विपक्ष ने एक मुद्दे को पकड़ा, तो वह गरमाता ही गया। यहां तक कि लोकसभा अध्यक्ष को कुछ तल्ख चेतावनी देनी पड़ी कि अगर सदन की मर्यादा का ध्यान नहीं रखा जाएगा, तो वे सासंदों के खिलाफ कार्रवाई करने को विवश होंगे। सत्तापक्ष कह रहा है कि इस तरह हंगामे की वजह से रोजाना लाखों रुपए का नुकसान हो रहा है। बहुत सारे मसलों पर फैसला नहीं लिया जा पा रहा। यह एक तरह से लोकतंत्र की हत्या है। मगर इन सब बातों का विपक्ष पर कोई असर नजर नहीं आ रहा।

दरअसल, इस बार विपक्ष को एक ऐसा मुद्दा मिल गया है, जिस पर वह अपनी ताकत दिखा सकता है। इसलिए भी वह जासूसी के मामले को पकड़े हुए है। राहुल गांधी की दावत में उनकी एकजुटता से कई लोग कयास लगा रहे हैं कि यह उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव और फिर अगले लोकसभा चुनाव के नतीजे प्रभावित कर सकती है। मगर यह अभी दूर की कौड़ी है। जो दल अभी एक साथ दिख रहे हैं, उन सबके अपने क्षेत्रीय स्वार्थ और उनके बीच परस्पर खींचतान है। इसके पहले भी कई चुनावों में एक साथ मिल कर मजबूत प्रतिपक्ष बनाने की कोशिशें हो चुकी हैं, पर वे सफल नहीं हो पार्इं। इसलिए इस एकजुटता को लेकर कोई चुनावी आकलन करना अभी जल्दबाजी होगी।

फिलहाल मुद्दा जासूसी मामले की जांच का है। यह समझ से परे है कि सरकार इसे लेकर इतना अड़ियल रुख क्यों अपनाए हुए है। एक तो यह कारण हो सकता है कि इस हंगामे की वजह से उसे दूसरे मुद्दों पर जवाब देने से मुक्ति मिल गई है, जो उसे असहज कर सकते हैं। दूसरा यह कि उसे विपक्ष की मांग मान लेना अपनी पराजय मालूम पड़ती हो। मगर लोकतंत्र में किसी वाजिब मांग को भी सरकार का अपनी हार-जीत का मसला बना लेना किसी भी रूप में अच्छा नहीं माना जाता।

जासूसी का मसला गंभीर है, इसे लेकर फ्रांस और इजराइल में जांच चल रही है, जिससे कुछ खुलासे अवश्य सामने आएंगे। इसलिए सरकार का यह अड़ियल रवैया उसे कोई फायदा पहुंचाने वाला नहीं जान पड़ता। सरकार बेशक कह रही हो कि इस तरह हंगामा करना लोकतंत्र की हत्या है, पर भाजपा को यह नहीं भूलना चाहिए कि 2-जी और कोयला खदान आबंटन मामले में उसने भी यही रास्ता अख्तियार किया था। अगर सरकार सचमुच मानसून सत्र को सुचारु रूप से चलाने और विभिन्न विषयों पर बहस कराने को लेकर संजीदा है, तो उसे लचीला रुख अपनाना होगा। विपक्ष से भी अपेक्षा की जाती है कि वह बीच का कोई रास्ता अपनाए।

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