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संपादकीयः सफर और मंजिल

एक बार में तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत को गैर-कानूनी करार देने वाला विधेयक गुरुवार को लोकसभा में पारित हो गया। निश्चय ही यह एक ऐतिहासिक घटना है।

Author December 30, 2017 3:38 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

एक बार में तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत को गैर-कानूनी करार देने वाला विधेयक गुरुवार को लोकसभा में पारित हो गया। निश्चय ही यह एक ऐतिहासिक घटना है। विधेयक को लोकसभा की मंजूरी मिलने के साथ ही तीन तलाक के खिलाफ मुसलिम महिलाओं के संघर्ष का सफर अपनी मंजिल पर पहुंच गया। गौरतलब है कि विधेयक को सदन के अधिकतर सदस्यों का समर्थन मिला। कांग्रेस समेत ज्यादातर विपक्षी दलों ने भी विधेयक की हिमायत की। विपक्ष के इस रुख को देखते हुए सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यह विधेयक राज्यसभा में भी पारित हो जाएगा। अलबत्ता विधेयक के कुछ प्रावधानों पर कई सदस्यों ने एतराज जताए और उन पर तीखी बहस भी हुई। लेकिन विधेयक को लेकर आम सहमति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कई सदस्यों की तरफ से आए संशोधन-प्रस्ताव गिर गए। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी विधेयक पर चर्चा के वक्त मौजूद नहीं थे। क्या यह सिर्फ संयोग था, या यह सोची-समझी अनुपस्थिति थी? लोकसभा में विधेयक का साथ देने के अलावा कांग्रेस ने अलग से एक बयान जारी करके भी समर्थन जताया। इस तरह शाह बानो के चर्चित मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के कोई तीन दशक बाद कांग्रेस ने उस समय से अलग रुख अख्तियार किया है। जाहिर है, इसमें अपने आप एक भूल का स्वीकार है, वह यह कि मुसलिम महिलाओं के मामलों में उन्हीं के हित से विचार किया जाना चाहिए, न कि परंपरागत रूप से ताकतवर मुसलिम संगठनों के नजरिए से। कांग्रेस के अलावा तृणमूल कांग्रेस समेत विपक्ष की दूसरी पार्टियों ने भी काफी सतर्क रुख अपनाया; सतर्कता इस बात की थी कि भाजपा उन्हें आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड या मौलानाओं के पाले में चित्रित न कर पाए।

विधेयक का आम राय से पारित होना विपक्ष के ‘रणनीतिक भूल सुधार’ के अलावा मुसलिम महिलाओं में जागृति का भी परिणाम है, जिसकी अनदेखी अब कोई पार्टी नहीं करना चाहती। यह सही है कि भारतीय जनता पार्टी तीन तलाक का मसला जोर-शोर से उठाती रही, और कानून बन जाने पर वह उसका श्रेय लेने में भी कोई कसर नहीं छोड़ेगी। पर विधेयक दरअसल कुछ मुसलिम महिलाओं की याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की देन है। इस साल अगस्त में सर्वोच्च अदालत के पांच जजों के एक पीठ ने तीन-दो के बहुमत से तीन तलाक या तलाक-ए-बिद्दत को अवैध और असंवैधानिक ठहराया था। फिर, पीठ में शामिल दो जजों ने यह भी कहा था कि सरकार तीन तलाक पर छह महीने में कानून बनाए। इस फैसले का व्यापक स्वागत हुआ था।। हालांकि इस फैसले के कुछ समय बाद एक बार सरकार ने कहा था कि इस बारे में कानून बनाने का उसका कोई इरादा नहीं है। पर बाद में उसे यह इल्म हुआ होगा कि अगर कानून नहीं बना तो सर्वोच्च अदालत के फैसले का व्यवहार में कोई मतलब नहीं रह जाएगा। फिर, विधेयक लाने की घोषणा कर दी गई। विधेयक में प्रावधान है कि तीन तलाक चाहे वह लिखित, मौखिक या डिजिटल रूप में हो, अमान्य होगा। ऐसा करने पर तीन साल की जेल और जुर्माना भी होगा। दूसरे प्रमुख प्रावधान के मुताबिक तलाक-ए-बिद्दत की दशा में पत्नी और आश्रित बच्चों के जीवनयापन तथा दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए गुजारा भत्ता की व्यवस्था है। पत्नी नाबालिग बच्चों की अभिरक्षा की भी हकदार होगी।

लेकिन तीन साल की सजा के प्रावधान पर काफी सवाल उठे हैं, संसद के भीतर भी और संसद के बाहर भी। यहां तक कि मुसलिम महिला संगठनों को भी यह सवाल कुरेद रहा है। सवाल यह है कि अगर तीन तलाक की दशा में पति को तीन साल की जेल हो जाती है, तो पत्नी और नाबालिग बच्चों के गुजारे की व्यवस्था कैसे होगी, क्योंकि जेल में रहने की अवस्था में पति की आय का जरिया छिन चुका होगा। सरकार इस सवाल का कोई संतोषजनक जवाब अभी तक नहीं दे सकी है, पर ऐसे संकेत हैं कि शायद सजा का प्रावधान तीन साल से कम किया जाएगा। तीन तलाक के खिलाफ कानून स्वागत-योग्य है, पर यह भी जरूरी है कि कानून का प्रारूप अधिक से अधिक तर्कसंगत हो।

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