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संपादकीयः सजा का पैमाना

करीब ढाई महीने पहले गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशन स्कूल में प्रद्युम्न नामक बच्चे की हत्या के बाद यह सवाल उठा था कि इतने महंगे स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा के इंतजाम इतने लचर कैसे हैं।
Author December 21, 2017 02:24 am
प्रद्युम्न

करीब ढाई महीने पहले गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशन स्कूल में प्रद्युम्न नामक बच्चे की हत्या के बाद यह सवाल उठा था कि इतने महंगे स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा के इंतजाम इतने लचर कैसे हैं। इस हत्याकांड में पुलिस ने पहले केवल संदेह के आधार पर स्कूल बस के एक कर्मचारी को गिरफ्तार कर लिया था। मगर उस पर सवाल उठने के बाद जब सीबीआई ने जांच की तो मामला पलट गया और उसी स्कूल के ग्यारहवीं में पढ़ने वाले एक छात्र को हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया। लेकिन आरोपी छात्र की उम्र चूंकि सोलह साल थी, इसलिए यह उलझन पैदा हुई कि उस पर किशोर न्याय अधिनियम के तहत मुकदमा चलेगा या वयस्कों की तरह। पिछले कुछ सालों के दौरान अनेक ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में शामिल कई ऐसे आरोपी भी पकड़े गए, जिनकी उम्र सोलह से अठारह साल के बीच थी।

खासकर दिसंबर, 2012 में दिल्ली में चलती बस में एक मेडिकल छात्रा से बलात्कार और बर्बर तरीके से की गई हत्या के आरोपियों में एक नाबालिग भी था। पुराने कानूनों के मुताबिक उसे सजा के तौर पर सिर्फ तीन साल सुधारगृह में रखा जा सकता था। उसी दौरान आम लोगों के बीच उभरे क्षोभ के मद्देनजर किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2014 अस्तित्व में आया, जिसके बाद कुछ वैसे अपराधों में शामिल किशोरों पर वयस्कों की तरह मुकदमा चलाने का रास्ता साफ हो गया, जिन्हें कानूनी परिभाषा में जघन्य अपराधों की श्रेणी में रखा जाता है।

नए कानून में एक प्रावधान है कि आरोपी किशोर पर वयस्कों की तरह यह मुकदमा चलाया जाए या नहीं, इसका फैसला करने का अधिकार किशोर न्याय बोर्ड के पास होगा। अब इसी बोर्ड ने प्रद्युम्न की हत्या के आरोपी के संबंध में यह फैसला दिया है कि उस पर वयस्कों की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है। हालांकि इस कानून में दर्ज प्रावधानों के मुताबिक उसे उम्र कैद या मौत की सजा नहीं दी जा सकेगी। नया कानून बनने के यह पहला मामला है, जिसमें किशोर न्याय बोर्ड ने किसी नाबालिग पर वयस्क की तरह मामला चलाने का फैसला सुनाया है। लेकिन अपराध के बाद कानून के तहत आरोपी को सजा दिलाने से आगे यह भी सोचने की जरूरत है कि देश और समाज में वे कौन-सी परिस्थितियां मौजूद हैं या हाल के वर्षों में विकसित हुई हैं कि किशोर उम्र के कई बच्चे भी आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने से नहीं हिचकते।

अभी तक किसी अपराध में पकड़े गए बच्चों के बारे में आम धारणा थी कि वे सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े परिवारों और इलाकों में रहते हुए बेलगाम हो जाते हैं। लेकिन कुछ ऐसे मामले भी सामने आए, जिनमें महंगे स्कूलों में पढ़ने वाले संपन्न और शिक्षित परिवारों के बच्चे छोटे-बड़े अपराधों में शामिल पाए गए। रेयान स्कूल में प्रद्युम्न की हत्या के आरोप में जिस किशोर को सीबाआई ने पकड़ा, उसके मुताबिक उसने स्कूल में परीक्षा को टालने के लिए ऐसा किया। सवाल है कि इस मकसद से ऐसा भयावह खयाल और उसे अंजाम देने का विचार और हिम्मत उसके भीतर कहां से आई, उसके लिए उसे मानसिक खुराक कहां से मिली। किसी भी किशोर को अपराध के लिए सजा दिलाने का प्रावधान कानून में है, लेकिन सरकार और समाज को सोचने की जरूरत है कि आखिर कम उम्र के बच्चे गंभीर किस्म के अपराध की दुनिया में किन वजहों से चले जाते हैं।

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