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संपादकीयः संदेह से परे

इवीएम यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को लेकर घिरे संदेह के बादल अब छंटने वाले हैं।

Author Published on: September 22, 2017 3:37 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फाइल फोटो)

इवीएम यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को लेकर घिरे संदेह के बादल अब छंटने वाले हैं। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के परिपालन में सभी राज्यों के मुख्य चुनाव अधिकारियों को भेजे परिपत्र में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वीवीपैट युक्त इवीएम तैयार करने का काम चरणबद्ध तरीके से पूरा करने के लिए कहा है। वीवीपैट (वोटर वेरीफिएबुल आॅडिट ट्रेल) वोटिंग मशीन में फिट की गई ऐसी तरकीब है, जिससे मतदादा यह जान सकता है कि उसका मत सही पड़ा है या नहीं। विशेषज्ञों का दावा है कि इस तरकीब से मतदान में किसी किस्म की धांधली नहीं की जा सकती। अब अगर चुनाव आयोग, भले ही सुप्रीम कोर्ट के टोकने पर ही इस प्रविधि को अपनाने की दिशा में चल पड़ा है तो इसकी सराहना की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने आठ अक्तूबर, 2013 को चुनाव आयोग को वीवीपैटयुक्त इवीएम से चुनाव कराने की इजाजत दी थी।

गौरतलब है कि 2014 में हुए लोकसभा और कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद इवीएम के जरिए मतदान में धांधली करने का आरोप लगाया गया था। बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने तो बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यह आरोप लगाया था कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में इवीएम में छेड़छाड़ करके चुनाव को प्रभावित किया गया है। ठीक इसी तरह के आरोप आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने भी लगाए थे। उन्होंने तो चुनाव आयोग में लिखित शिकायत भी की थी और दिल्ली विधान सभा में इवीएम हैकिंग का मुजाहिरा भी किया गया। हालांकि चुनाव आयोग ने इस तरह के आरोपों और शिकायतों को निराधार ही बताता रहा है। लेकिन यह भी देखा गया कि बड़ी संख्या में राजनीतिक दलों के नेताओं ने इवीएम पर सवाल उठाने शुरू किए तो इसी साल 12 मई को चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक दलों पर इस मसले पर विचार विमर्श भी किया। लेकिन एक बड़ी समस्या वीवीपैट लगाने के लिए आने वाली लागत को लेकर भी थी। चुनाव आयोग ने इसके लिए केंद्र सरकार से करीब तीन हजार करोड़ रुपयों की मांग की थी।

अब जबकि चुनाव आयोग ने सौ प्रतिशत वीवीपैटयुक्त इवीएम से चुनाव कराने की तैयारी शुरू कर दी है तो समझा जाना चाहिए कि इससे वह अपने आलोचकों का मुंह भी बंद कर सकेगा। जाहिर है कि लोकसभा की रिक्त सात सीटों पर उपचुनाव तथा साल के अंत तक गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। पंजाब की गुरदासपुर सीट पर तो अगले महीने 11 अक्तूबर को उपचुनाव है। इसके अलावा दो-दो सीटें राजस्थान और उत्तर प्रदेश तथा एक-एक सीट बिहार और पश्चिम बंगाल में खाली हैं। अगले साल राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव होने हैं। इसीलिए चुनाव आयोग ने राज्य चुनाव आयोगों से तत्परता बरतने के लिए कहा है। वास्तव में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में चुनाव एक चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया रही है। मतदान की प्रक्रिया ने कई चरण पार किए हैं। पहले मतपत्रों के जरिए चुनाव होता था। लंबे समय तक बूथ कैपचरिंग और फर्जी मतदान भी एक बड़ी समस्या थी, लेकिन इवीएम के जरिए मतदान ने उस बुराई को एक झटके में खत्म कर दिया। अब जबकि इस व्यवस्था पर उंगली उठने लगी तो उसे भी निरापद बनाने का तरीका सामने आया ही। आखिरकार चुनाव आयोग को हर शक-ओ-शुबहा से ऊपर होना ही चाहिए।

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