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संपादकीयः बेलगाम आतंक

जम्मू-कश्मीर से अगर कुछ दिन तक आतंकी हमले की खबर नहीं आती है तो यह उम्मीद बंध जाती है कि वहां हालात काबू में हैं।

Author Published on: September 22, 2017 4:16 AM
पुलवामा में आतंकियों ने एयर फोर्स स्‍टेशन पर हमला किया है। (फाइल फोटो)

जम्मू-कश्मीर से अगर कुछ दिन तक आतंकी हमले की खबर नहीं आती है तो यह उम्मीद बंध जाती है कि वहां हालात काबू में हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि आतंकवादियों का मकसद यह भी है कि जम्मू-कश्मीर में जनजीवन के सहज होने की स्थिति बनने ही न पाए। गुरुवार को एक बार फिर दक्षिणी कश्मीर के पुलवामा इलाके में आतंकवादियों ने ग्रेनेड से हमला किया, जिसमें तीन नागरिकों की जान चली गई और कम से कम तीस अन्य लोग बुरी तरह घायल हो गए। घायलों में पुलिसकर्मी और अर्धसैनिक बल के जवान भी हैं। यह हमला पुलवामा जिले के त्राल कस्बे में बस स्टैंड के पास उस वक्त किया गया, जब वहां से राज्य के एक मंत्री का काफिला गुजर रहा था। गनीमत रही कि मंत्री तो बाल-बाल बच गए, लेकिन उनका ड्राइवर घायल हो गया। हो सकता है कि हमले का निशाना शायद वही रहे हों। पुलवामा में इस ताजा हमले को आतंकवादियों की हताशा से उपजी प्रतिक्रिया भी कहा जा सकता है। दरअसल, कुछ समय पहले इसी इलाके में सीआरपीएफ, पुलिस और सेना ने मिल कर दो आतंकवादियों को मार गिराया था। मारे गए आतंकियों में एक स्थानीय था और एक पाकिस्तानी।
यों यह एक जगजाहिर हकीकत है कि ऐसे आतंकी हमलों को आमतौर पर पाकिस्तान की शह मिलती रहती है। लेकिन अमूमन हर बार अंगुली उठाए जाने के बाद पाकिस्तान अपना हाथ होने से इनकार कर देता है।

हाल ही में जब चीन में संपन्न ब्रिक्स सम्मेलन के संयुक्त घोषणा पत्र में पाकिस्तान के ठिकानों से काम करने वाले लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों की आलोचना की गई, तब पाकिस्तान थोड़ा बचाव की स्थिति में दिखा। पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कबूल भी किया कि लश्कर और जैश जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित संगठन अपनी गतिविधियों के लिए पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल करते हैं और उन्हें रोकना होगा। गौरतलब है कि भारत और खासतौर पर जम्मू-कश्मीर इलाके में होने वाले आतंकी हमलों में आमतौर पर इन्हीं संगठनों का हाथ होता है। विडंबना यह है कि आतंक के खिलाफ सुरक्षात्मक गतिविधियों के चलते न केवल जम्मू-कश्मीर का आम जनजीवन कभी सहज नहीं हो पाता है, बल्कि इसी से उपजी दूसरी समस्याएं राजनीतिक शक्ल अख्तियार करके जटिल रूप ले लेती हैं। आज अगर कश्मीर में केंद्र और राज्य की सरकारों को अपनी बहुत सारी ऊर्जा खर्च करनी पड़ रही है तो इसकी वजह यही है।

लेकिन सवाल यह भी है कि पिछले काफी सालों से लगातार आतंकवाद पर लगाम लगाने के लिए हर संभव उपाय किए जाने के दावे के बावजूद ऐसे हमले क्यों नहीं रुक पा रहे हैं। बल्कि ऐसा लगता है कि अब शायद यही वहां की ऐसी एकमात्र समस्या है जिससे निपटना सरकार, पुलिस और सेना का मुख्य कार्य रह गया है। पिछले साल नोटबंदी की घोषणा के बाद देश के लोगों को यह बात जोर देकर बताई गई थी कि इससे आतंकवादियों की कमर टूट जाएगी। फिर सर्जिकल स्ट्राइक का हवाला देकर यह भी दावा किया गया कि अब भारत में घुसपैठ करने या किसी भी आतंकवादी हमले से पहले आतंकवादी संगठन सौ बार सोचेंगे। लेकिन हालत यह है कि आज भी आतंकी हमलों में कोई कमी नहीं आई है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इन आतंकी हमलों के पीछे पाकिस्तान से अपनी गतिविधियां चलाने वाले संगठनों का हाथ है। लेकिन सवाल देश में आतंरिक सुरक्षा के उन इंतजामों पर भी उठते हैं, जिनमें आतंकी हमला करने वालों का मनोबल बढ़ा रहता है।

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