ताज़ा खबर
 

चौपालः संघर्ष का सुफल

सर्वोच्च न्यायालय के बहुमत के फैसले ने तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को असंवैधानिक मानते हुए उसे निरस्त कर मुसलिम महिलाओं के सम्मान व हक को प्रतिष्ठित किया है।

प्रतिकात्मक तस्वीर।

सर्वोच्च न्यायालय के बहुमत के फैसले ने तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को असंवैधानिक मानते हुए उसे निरस्त कर मुसलिम महिलाओं के सम्मान व हक को प्रतिष्ठित किया है। अपने परिवेश के तमाम दबावों को दरकिनार करते हुए सायरा बानो, आफरीन रहमान, अतिया साबरी, इशरत जहां, गुलशन परवीन जैसी जुझारू महिलाओं ने एक बार फिर ‘संघर्ष का रास्ता ही सही रास्ता है’ उक्ति को चरितार्थ किया है। मुसलिम महिलाओं को अधिकार के लिए न्यायालय के जरिए लड़ने की प्रेरणा, साहस व ऊर्जा हालिया इतिहास के शाहबानो प्रकरण से प्राप्त होती है। गौरतलब है कि गुजारा भत्ते के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ने और जीतने के बाद शाहबानो हार गई थी। वोट की राजनीति और कट्टरपंथियों के दबाव के समक्ष उन्हें न्यायालय के अपने पक्ष में आए निर्णय से खुले तौर पर असहमति भी जाहिर करनी पड़ी थी।

शाहबानो प्रकरण के विरुद्ध रैली में शामिल होने पर मैंने अपने एक प्रगतिशील विचारों के वरिष्ठ साहित्यकार मित्र को आड़े हाथों लिया था तो उन्होंने लाचारगी व्यक्त करते हुए कहा था कि मेरी चार बेटियों की शादी और कब्रिस्तान में जगह का सवाल है! रूढ़ियों में जकड़े समाज की जड़ताओं को तोड़ना बड़ी चुनौती है और इस परिदृश्य में ताजा फैसला एक बड़ी उपलब्धि है। इस फैसले को हिंदू या मुसलिम के नजरिये से देखने, राजनीतिक हित-लाभ के हिसाब से प्रतिक्रिया देने या चुप्पी साधने से महिला मुक्ति के आंदोलन का नुकसान ही होगा। स्त्री मुक्ति के संघर्ष में विजय की ओर यह एक सार्थक कदम है, इसका महत्त्व है और इसी भाव से इसका स्वागत किया जाना चाहिए।

स्त्री मुक्ति की लड़ाई लंबी व बहुआयामी है और न्यायालयों की अपनी सीमाए हैं। धार्मिक, सांप्रदायिक, जातीय जकड़नों, मध्ययुगीन मानसिकताओं, औरत को वस्तु समझने, उसे विज्ञापन का औजार बनाने वाली शक्तियों, अंधविश्वासों, कुरीतियों, कर्मकांडों को महिमामंडित कर स्वार्थ साधने वालों, हिंसक व यौन हमलावरों से घिरी स्त्री जाति को सम्मान व गरिमामय जीवन के लिए अपना एजेंडा बना कर सामूहिक चेतना अभियान की रूपरेखा निर्धारित करनी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का हश्र शाहबानो प्रकरण जैसा न हो इसके लिए सतर्कता, जागरूकता सुनिश्चित करना पूरे समाज की जिम्मेदारी है।
न्यायालय के निर्णय की रोशनी में सरकार को तीन तलाक के विरुद्ध शीघ्र एक प्रभावी कानून बना कर उसका क्रियान्वयन भी सुनिश्चित करना चाहिए। उलेमाओं व मौलवियों को किंतु-परंतु लगाने के बजाय महिलाओं की भावनाएं समझते हुए न्यायालय के निर्णय के संदेश को साफ पढ़ना चाहिए और आधुनिक व विज्ञान सम्मत शिक्षा के लिए समाज को प्रेरित करना चाहिए।
’सुरेश उपाध्याय, गीता नगर, इंदौर

Next Stories
1 संपादकीयः आरक्षण का आधार
2 दाऊद के ठिकाने
3 हादसा दर हादसा
ये पढ़ा क्या?
X