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संपादकीयः मौत के सीवर

हाल ही में आए एक अध्ययन के मुताबिक, केवल इस साल के शुरुआती छह महीनों में ही सीवर की सफाई करते हुए पचास से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। इसके अलावा, आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक पिछले लगभग ढाई दशक के दौरान करीब सवा छह सौ लोग यही काम करते हुए मारे गए।

Author Published on: August 24, 2019 3:07 AM
एक बड़ी समस्या यह भी है कि ऐसी हर घटना में आमतौर पर जिम्मेदार ठेकेदारों को शायद ही कभी ऐसी सजा हो पाती है जिससे बाकी लोग सबक ले सकें। यही वजह है कि सरकार के स्तर पर सीवर की सफाई का काम ठेकेदारों को सौंपा जाता है और वे बिना किसी संकोच या डर के सफाई मजदूरों को बिना किसी सुरक्षा उपकरणों के भारी जोखिम के बीच जहरीली गैसों से भरे सीवर में उतार देते हैं।

इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि एक ओर हमारा देश चांद और मंगल पर या फिर अंतरिक्ष में शोध और अध्ययन के लिए उच्च क्षमता के प्रक्षेपण यानों को भेज कर नित नए वैज्ञानिक प्रयोग कर रहा है और दूसरी ओर सीवर की सफाई के जो मौजूदा इंतजाम हैं, उनमें इंसानों की जान चली जा रही है। जाहिर है, यह राजनीतिक इच्छाशक्ति में कमी का ही उदाहरण है कि जिन कामों में मशीनों की जरूरत सबसे ज्यादा है, वे आज भी साधारण लोगों के बूते चल रहे हैं और अक्सर उनके मरने की खबरें आती हैं। गौरतलब है कि गुरुवार को गाजियाबाद के नंदग्राम इलाके में एक सीवर लाइन की सफाई के दौरान दम घुटने से पांच मजदूरों की मौत हो गई। ऐसी तमाम घटनाओं की तरह एक बार फिर इसे भी आम दुर्घटना के रूप में ही देखा जाएगा और किसी रिवायत की तरह मुआवजा और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही जाएगी। लेकिन कुछ ही दिनों के बाद शायद फिर सब कुछ पहले की तरह चलने लगेगा। सवाल है कि घातक जोखिम के अलावा इस काम के संबंध में तमाम कानूनी व्यवस्था के बावजूद अगर जानलेवा सफाई में लोगों को झोंका जा रहा है और उनकी जान जा रही है तो क्या इसे परोक्ष रूप से हत्या की घटनाएं नहीं कहा जा सकता है!
हाल ही में आए एक अध्ययन के मुताबिक, केवल इस साल के शुरुआती छह महीनों में ही सीवर की सफाई करते हुए पचास से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। इसके अलावा, आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक पिछले लगभग ढाई दशक के दौरान करीब सवा छह सौ लोग यही काम करते हुए मारे गए। आखिर इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और इससे संबंधित कानूनों के लागू होने के बावजूद यह काम सरेआम कैसे चलता रहा है? ऐसी घटनाओं में लगातार होने वाली मौतों के बावजूद सीवर की सफाई का वही पुराना तौर-तरीका कैसे बना हुआ है? यह किसी से छिपा नहीं है कि हर कुछ रोज के बाद देश के किसी न किसी हिस्से से सीवर की सफाई के दौरान लोगों के मरने की खबरें आती रहती हैं। इस तरह की हर घटना के बाद राहत और कार्रवाई का आश्वासन देने में कोई कमी नहीं करने वाली सरकार के सामने सरेआम सीवर में जोखिम के हालात में सफाई का काम होता रहता है, लेकिन नेता से लेकर संबंधित महकमे के अधिकारी इसके प्रति अपनी आंखें मूंदे रखते हैं।

एक बड़ी समस्या यह भी है कि ऐसी हर घटना में आमतौर पर जिम्मेदार ठेकेदारों को शायद ही कभी ऐसी सजा हो पाती है जिससे बाकी लोग सबक ले सकें। यही वजह है कि सरकार के स्तर पर सीवर की सफाई का काम ठेकेदारों को सौंपा जाता है और वे बिना किसी संकोच या डर के सफाई मजदूरों को बिना किसी सुरक्षा उपकरणों के भारी जोखिम के बीच जहरीली गैसों से भरे सीवर में उतार देते हैं। कानूनन गलत और अमानवीय होने के बावजूद क्या यह सब इसलिए बिना रोकटोक के चलता रहा है कि इस काम में लगे मजदूर आमतौर पर सामाजिक पायदान के सबसे निचले हिस्से और कमजोर तबके से आते हैं! यह सवाल भी स्वाभाविक है कि अगर हम विज्ञान की शानदार कामयाबियों के साथ उच्च स्तर के मशीनों और यंत्रों का निर्माण और उनके उपयोग से बड़ी उपलब्धियां हासिल कर रहे हैं तो सीवर की सफाई के लिए अब तक इंसानों को ही जहरीले गैसों से भरे नालों में मरने के लिए क्यों उतरना पड़ता है?

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