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संपादकीयः समाधान की दिशा

राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का मामला सुलझाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने इस साल मार्च में न्यायमूर्ति एफएमआइ कलीफुल्ला की अध्यक्षता में तीन सदस्यों के पैनल का गठन किया था। लेकिन अब मामले के पक्षकारों ने जिस तरह की दलीलें संविधान पीठ के सामने रखी हैं, वे एक तरह से मध्यस्थता पैनल के प्रयासों को लेकर सवाल उठाने जैसा है।

Author July 13, 2019 2:10 AM
अयोध्या का मसला हिंदू और मुसलमानों की आस्था से जुड़ा है, इसलिए पैनल के सदस्यों के लिए भी सर्वमान्य समाधान सुझाना और संबंधित पक्षों को इसके लिए तैयार करना कोई आसान काम नहीं है।

इस साल मार्च में सर्वोच्च न्यायालय ने राम जन्मभूमि मामले को मध्यस्थता से सुलझाने का जो कदम बढ़ाया था, उससे उम्मीद बंधी थी कि बरसों पुरानी इस समस्या का अब कोई समाधान निकल पाएगा। लेकिन जिस तरह के संकेत आ रहे हैं, उससे यह नहीं लग रहा कि मामला बातचीत से सुलझ पाएगा। इसीलिए मामले की सुनवाई करने वाले संविधान पीठ को गुरुवार को कहना पड़ा कि अगर मध्यस्थता से बात नहीं बनी तो अदालत 25 जुलाई से इस मुकदमे की रोजाना सुनवाई शुरू कर देगी। अदालत ने इस मामले में मध्यस्थता पैनल से 18 जुलाई तक प्रगति रिपोर्ट पेश करने को कहा है, ताकि इसका आकलन किया जा सके कि मामला कहां तक पहुंचा और मध्यस्थता के जरिए इसके समाधान की गुंजाइश कितनी बन पा रही है। इसके बाद ही संविधान पीठ मामले की सुनवाई में आगे बढ़ेगा। अदालत ने यह बात तब कही जब इस मामले के एक पक्षकार गोपाल सिंह विशारद की ओर से पेश वकील ने कहा कि मध्यस्थता के जरिए मामला सुलझ पाना मुश्किल है, इसलिए अदालत को ही इस मामले की सुनवाई शुरू कर देनी चाहिए।

सवाल यह है कि मध्यस्थता पैनल का काम अभी पूरा भी नहीं हुआ है और उसने इस काम के लिए पंद्रह अगस्त तक का वक्त मांगा है। तब संबंधित पक्षकारों की ओर से अदालत के समक्ष इस समय ऐसे तर्क क्यों पेश किए जा रहे हैं जो मामले की जल्द सुनवाई के लिए दबाव बनाने वाले हों? बेहतर होता कि मध्यस्थता पैनल की रिपोर्ट आने तक इंतजार कर लिया जाता। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का मामला सुलझाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने इस साल मार्च में न्यायमूर्ति एफएमआइ कलीफुल्ला की अध्यक्षता में तीन सदस्यों के पैनल का गठन किया था। लेकिन अब मामले के पक्षकारों ने जिस तरह की दलीलें संविधान पीठ के सामने रखी हैं, वे एक तरह से मध्यस्थता पैनल के प्रयासों को लेकर सवाल उठाने जैसा है। विशारद के वकील ने अदालत से कहा कि याचिकाकर्ता के पिता ने जनवरी 1950 में यह मामला दायर किया था और अब याचिकाकर्ता खुद अस्सी साल के हो चुके हैं। ऐसे में इस मामले को जल्द सुलझाया जाना चाहिए और इसका समाधान मध्यस्थता से संभव नहीं लग रहा।

इसी बीच एक और पक्षकार रामलला विराजमान के वकील ने भी जल्द सुनवाई का अनुरोध किया। निर्मोही अखाड़े के वकील ने कहा कि पक्षकारों के बीच सीधी बातचीत होनी चाहिए, लेकिन इस मामले में अभी तक पक्षकारों के बीच सीधे ऐसी कोई बातचीत नहीं हुई है, जिससे मामले का हल निकलता नजर आए। मुस्लिम पक्ष के वकील ने इन सबका विरोध किया और अदालत से अनुरोध किया कि इस तरह के तर्कों, दलीलों और सुझावों पर विचार नहीं किया जाए। तब संविधान पीठ को कहना पड़ा कि वह मध्यस्थता पैनल की अब तक की प्रगति का जायजा लेगा और लगेगा कि पैनल को कोई सफलता नहीं मिल रही है तो वह 25 जुलाई से सुनवाई शुरू कर देगा। मध्यस्थता पैनल के सदस्य तेरह मार्च से 16 जून के बीच चार बार अयोध्या जा चुके हैं और संबंधित पक्षों तथा महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों से बात भी की है। जब तक पैनल अपनी अंतिम रिपोर्ट अदालत के समक्ष दाखिल नहीं कर देता तब तक इस मामले पर अंतिम रूप से कुछ भी कह पाना उचित नहीं है। अयोध्या का मसला हिंदू और मुसलमानों की आस्था से जुड़ा है, इसलिए पैनल के सदस्यों के लिए भी सर्वमान्य समाधान सुझाना और संबंधित पक्षों को इसके लिए तैयार करना कोई आसान काम नहीं है। फिर भी उम्मीद यही की जानी चाहिए कि पैनल के सदस्य कोई रास्ता निकालेंगे।

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