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संपादकीयः पाक की मुश्किल

आतंकवाद को लेकर पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान पर शिकंजा तेजी से कसा है। अमेरिका और यूरोपीय देशों की पहले से ही यह संभव हुआ है। एफएटीए इन्हीं देशों की पहल पर बना संगठन है जो दुनिया के उन मुल्कों के खिलाफ कड़े प्रतिबंध लगाता है जो अपनी जमीन से आतंकवादी कार्रवाइयों को अंजाम देते हैं और आतंकवाद संगठनों को पालते-पोसते हैं।

Author Published on: December 26, 2019 2:15 AM
पाक पीएम इमरान खान, फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

आतंकवाद रोकने और आतंकी संगठनों के खिलाफ कड़े कदम उठाने को लेकर पाकिस्तान का संकट गहराता जा रहा है। अगर उसने वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (एफएटीए) की ओर से निर्धारित मानकों को पूरा नहीं किया तो अगले साल फरवरी तक उसे काली सूची में डालने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। अगर ऐसा हुआ तो पहले से आर्थिक संकटों का सामना कर रहे मुल्क के सामने कंगाली जैसे हालात बन सकते हैं। दो दिन पहले अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) ने जारी एक रिपोर्ट में इस बात की आशंका व्यक्त की है कि अगर एफएटीए पाकिस्तान को काली सूची में डाल देता है तो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था ढह जाएगी।

आइएमएफ को इस बात का डर है कि उसने पाकिस्तान को अरबों डॉलर का जो कर्ज दे रखा है और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए पाकिस्तान सरकार के साथ जो कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, उनका क्या होगा? एफएटीए की कार्रवाई पाकिस्तान को महंगी इसलिए पड़ेगी कि काली सूची में डाले जाने के बाद पाकिस्तान में बाहरी निवेश को जोरदार झटका लग सकता है। जाहिर है, किसी आतंकी देश में कोई अपनी पूंजी क्यों लगाएगा?

आतंकवाद को लेकर पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान पर शिकंजा तेजी से कसा है। अमेरिका और यूरोपीय देशों की पहले से ही यह संभव हुआ है। एफएटीए इन्हीं देशों की पहल पर बना संगठन है जो दुनिया के उन मुल्कों के खिलाफ कड़े प्रतिबंध लगाता है जो अपनी जमीन से आतंकवादी कार्रवाइयों को अंजाम देते हैं और आतंकवाद संगठनों को पालते-पोसते हैं। पाकिस्तान के बारे में तो सारी दुनिया एकमत है कि वह दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी देश है। यह बात खुद उसका सबसे पुराना हमदर्द और मददगार देश अमेरिका कहता आया है। भारत पिछले तीन दशक से पाकिस्तान के आंतक की मार झेल रहा है। एफएटीए पाकिस्तान से इसलामिक स्टेट, अलकायदा, जमात-उद-दावा, लश्करे तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हक्कानी नेटवर्क और तालिबान से जुड़े लोगों के खिलाफ सख्त कदम उठाने को लेकर चेतावनी देता रहा है, लेकिन हकीकत में अब तक ऐसा कुछ भी होता नहीं दिखा है। इस साल अगस्त में भी एफएटीए के एशिया प्रशांत समूह ने पाकिस्तान को अंतिम चेतावनी जारी की थी।

पाकिस्तान को 2012 से 2015 के दौरान भी एफएटीएफ की निगरानी सूची में रखा गया था। लेकिन उसने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया, जिससे यह पता चलता कि वह आतंकी संगठनों के खिलाफ कड़े कदम उठा रहा है। आतंकवाद का रास्ता देश को कंगाली के रास्ते पर ले जाना वाला है, यह पाकिस्तानी हुक्मरानों को सोचना चाहिए। विश्व बैंक भी पाकिस्तान को चेता चुका है। पाकिस्तानी रुपए में गिरावट का दौर जारी है। देश में महंगाई लगातार बढ़ रही है। विदेशी मुद्रा का भंडार पहले से ही पैंदे में जा चुका है। पाकिस्तानी मुद्रा के अवमूल्यन ने हालात और मुश्किल बना दिए हैं। तेल, गैस और सीएनजी की किल्लत से न सिर्फ लोग परेशान हैं, उद्योग-धंधे तक ठप पड़े गए हैं। सरकार गैस और तेल के दाम बढ़ाने की तैयारी में है। दूसरी ओर देश में बेरोजगारी चरम पर है। ऐसे में अगर पाकिस्तान को काली सूची में डाल दिया गया और कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए तो उससे देश में हालात बनेंगे, वे आज के मुकाबले कहीं ज्यादा भयावह होंगे। पाकिस्तान के पास अब भी वक्त है कि वह एफएटीए के मुताबिक चले। फैसला उसे ही करना है कि आतंकवाद को चुने या अमन को।

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