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संपादकीयः दुनिया के सामने

संयुक्त राष्ट्र महासभा का ताजा अधिवेशन ऐसे वक्त हो रहा है जब जम्मू-कश्मीर के उड़ी सेक्टर में हुए आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर है।

Author September 23, 2016 2:59 AM
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ

संयुक्त राष्ट्र महासभा का ताजा अधिवेशन ऐसे वक्त हो रहा है जब जम्मू-कश्मीर के उड़ी सेक्टर में हुए आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर है। इसलिए महासभा सत्र को संबोधित करते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने जो कुछ कहा वह हैरानी की बात नहीं है। अलबत्ता अपने इस भाषण से उन्होंने प्रकारांतर से पाकिस्तान को ही बेनकाब किया। इस अवसर पर बीस मिनट के अपने संबोधन में शरीफ ने कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन और सेना की ज्यादतियों का जिक्र बार-बार किया, पर यह कोई नई बात नहीं है। शायद ही किसी साल महासभा के सत्र में पाकिस्तान के प्रतिनिधि ने यह राग न छेड़ा हो। पर इसी क्रम में नवाज शरीफ ने बुरहान वानी का महिमामंडन करने में तनिक संकोच नहीं किया। वानी आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन का घोषित कमांडर था। ऐसे शख्स को ‘कश्मीर की आवाज’ बता कर शरीफ ने एक प्रकार से यही जताया है कि कश्मीर में आतंकवाद को शह देने का पाकिस्तान का पुराना रवैया कायम है।

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इस बार और भी जोर देकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने कश्मीर मसले का अंतरराष्ट्रीयकरण करने की कोशिश दोहराई। मगर शरीफ के इस प्रयास का क्या हश्र हुआ इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की-मून अपने संबोधन में सीरिया के संकट और फिलस्तीन मुद््दे से लेकर शरणार्थी समस्या तक बहुत-सी चीजों पर बोले, पर उन्होंने एक बार भी कश्मीर का जिक्र नहीं किया। विडंबना यह है कि शरीफ ने वानी का महिमामंडन करने के बाद यह दावा भी किया कि पाकिस्तान खुद आतंकवाद से सबसे ज्यादा पीड़ित देश है। जहां तक अपने लोगों के मारे जाने की बात है, पाकिस्तान इसके ढेर सारे हवाले दे सकता है। हक्कानी गुट और पाकिस्तान तालिबान जैसे आतंकी संगठनों ने पाकिस्तान में बेगुनाह लोगों का बहुत सारा खून बहाया है। पर इससे पाकिस्तान पाक-साफ नहीं हो जाता। पाकिस्तानी नागरिकों के आतंकवाद से पीड़ित होने के तथ्य अकाट्य हैं। पर जहां तक पाकिस्तान के राज्यतंत्र और हुक्मरानों का सवाल है, पिछले तीन दशक से वे भारत के खिलाफ आतंकवाद का ‘रणनीतिक इस्तेमाल’ करने से कभी बाज नहीं आए।

कुछ महीने पहले परवेज मुशर्रफ ने इस सच को खुलेआम स्वीकार किया था। पाकिस्तान के इस रवैये का भुक्तभोगी कुछ बरसों से अफगानिस्तान भी रहा है। इसलिए यह स्वाभाविक ही है कि भारत के विदेश सचिव विकास स्वरूप और विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर के अलावा अफगानिस्तान के विदेशमंत्री सलाहुद््दीन रब्बानी ने भी शरीफ के भाषण पर तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की और आतंकवाद के मामले में पाकिस्तान को आईना दिखाने में संकोच नहीं किया। विडंबना यह है कि वानी का महिमामंडन करने के साथ ही शरीफ ने भारत से वार्ता की इच्छा भी जताई। शायद दुनिया को यह जताने के लिए कि पाकिस्तान तो बातचीत के जरिए द्विपक्षीय मसले सुलझाना चाहता है, पर भारत ही इसके लिए तैयार नहीं है और तनाव बने रहने या बढ़ने देने के लिए वही जिम्मेवार है। लेकिन यह बहुत बार का अनुभव है कि जब भी वार्ता की पहल हुई या इसकी प्रक्रिया चली, बाधा पाकिस्तान की तरफ से आई। वहां की सरकार की ओरसे न सही, कट््टरपंथियों या फौज या आइएसआइ की तरफ से ही सही। कोई आतंकी हमला या सरहद पर संघर्ष विराम के उल्लंघन की कोई बड़ी घटना हो गई, और वार्ता की सहमति या चल चुकी प्रक्रिया पटरी से उतर गई। अच्छा होगा कि वार्ता की पेशकश करने से पहले शरीफ आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई की इच्छाशक्ति का परिचय दें।

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