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संपादकीयः मुखौटे के पीछे

भारत में मुखौटा कंपनियों का जाल कितना बड़ा है इसका अंदाजा सरकार की कुछ महीनों से चल रही कार्रवाई और उसके अनुमान से लगाया जा सकता है।

Author Published on: October 7, 2017 3:06 AM
कॉरपोरेट मामलों के राज्यमंत्री पीपी चौधरी

भारत में मुखौटा कंपनियों का जाल कितना बड़ा है इसका अंदाजा सरकार की कुछ महीनों से चल रही कार्रवाई और उसके अनुमान से लगाया जा सकता है। कॉरपोरेट मामलों के राज्यमंत्री पीपी चौधरी का कहना है कि मुखौटा कंपनियों के खिलाफ सरकार द्वारा चलाए जा रहे अभियान से करीब साढ़े चार लाख निदेशकों पर गाज गिर सकती है यानी उन्हें अयोग्य घोषित किया जा सकता है। मुखौटा या शेल कंपनी ऐसी कंपनी को कहते हैं जो कारोबार की आड़ में या कारोबार न करते हुए अवैध धन-संपत्ति जमा करने, काले धन को सफेद करने का जरिया होती हैं। कंपनी-पंजीयक के स्तर पर यह जान पाना मुश्किल होता है कि कोई कंपनी मुखौटा-कंपनी है या नहीं। यह एक प्रमुख कारण है कि मुखौटा कंपनियों का जाल फैलता गया है। पर अच्छी बात है कि सरकार ने इस धंधे पर पूरी तरह लगाम लगाने का फैसला किया है। पहली बार सरकार के स्तर पर मुखौटा कंपनियों के खिलाफ इतनी सक्रियता दिख रही है। इसका औचित्य जाहिर है, क्योंकि इसके बिना भ्रष्टाचार से नहीं निपटा जा सकता।

यह आम धारणा है, और यह सही भी है कि मुखौटा कंपनियां अवैध लेन-देन तथा कर-चोरी का सबसे संगठित रूप हैं। इनके खिलाफ आय कर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय और गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय ने तो अभियान छेड़ा ही है, भारतीय प्रतिभूति व विनिमय बोर्ड यानी सेबी ने भी कुछ कदम उठाए हैं। सेबी ने करीब दो महीने पहले तीन सौ इकतीस सूचीबद्ध कंपनियों को, उनके संदिग्ध व्यवहार के कारण, कारण बताओ नोटिस जारी किया था। जब बहुत-सी सूचीबद्ध कंपनियां संदेह के दायरे में हैं, तो गैर-सूचीबद्ध कंपनियों में कितनी कंपनियां नियम-कायदों का पालन करती होंगी इसकी कल्पना की जा सकती है। कंपनी मामलों के मंत्रालय के मुताबिक बाईस सितंबर तक 2,17, 239 कंपनियों का नाम रिकार्ड से हटा दिया गया। साथ ही, कंपनी कानून, 2013 के तहत तीन लाख से ज्यादा ऐसे निदेशकों की पहचान की गई है जिन्हें अयोग्य घोषित किया जा सकता है। अनुमान है कि अंतिम आंकड़ा साढ़े चार लाख तक पहुंच जाएगा। उपर्युक्त कानून के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति किसी कंपनी में निदेशक है और उस कंपनी ने लगातार तीन साल तक वित्तीय ब्योरा या वार्षिक रिटर्न नहीं दिया है तो उसे अयोग्य घोषित किया जाएगा। ऐसे निदेशकों की पृष्ठभूमि की जांच करना और अन्य कंपनियों से उनके संबंध का पता लगाना भी महत्त्वपूर्ण है। पर इस अभियान के बरक्स कुछ सावधानी बरतना भी जरूरी है।

कुछ बड़ी कंपनियां सशंकित हैं कि उन्हें भी बेकार में घसीटा जा सकता है, वहीं कई बाजार विश्लेषकों का मानना है कि कार्रवाई से पहले संबंधित कंपनियों को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाना चाहिए। इस तर्क को इस उदाहरण से भी बल मिला है कि सेबी ने संदिग्ध कंपनियों के शेयर बाजार में कारोबार करने पर पाबंदी का फैसला किया था। फिर उन कंपनियों ने सैट यानी प्रतिभूति व अपीलीय न्यायाधिकरण में अपील कर दी। सैट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया, अलबत्ता जांच आगे जारी रखने की इजाजत दे दी, ताकि यह पता चल सके कि उन्होंने प्रतिभूति-नियमों का उल्लंघन किया है या नहीं। लेकिन बहुत कुछ लगाम शुरुआती स्तर पर ही लगाई जा सकती है, क्योंकि एकल राजस्व, परिसंपत्ति, कर्मचारी-क्षमता आदि मानकों के आधार पर कंपनी की संजीदगी की पहचान की जा सकती है।

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