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संपादकीयः डोपिंग का फंदा

भारतीय पहलवान नरसिंह यादव के डोपिंग परीक्षण में फेल होने की खबर से रियो ओलंपिक में पदक की उम्मीद लगाए खेल प्रेमियों को गहरा धक्का पहुंचा है।
Author July 25, 2016 03:09 am
भारतीय पहलवान नरसिंह यादव। (फाइल फोटो)

भारतीय पहलवान नरसिंह यादव के डोपिंग परीक्षण में फेल होने की खबर से रियो ओलंपिक में पदक की उम्मीद लगाए खेल प्रेमियों को गहरा धक्का पहुंचा है। हालांकि अभी नरसिंह यादव के मामले में सुनवाई चल रही है और दावे से नहीं कहा जा सकता कि वे रियो ओलंपिक में हिस्सेदारी कर पाएंगे या नहीं। पर इस घटना ने एक बार फिर डोपिंग की प्रवृत्ति पर सोचने को मजबूर किया है। जब भी अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतिस्पर्धाएं शुरू होती हैं, कुछ खिलाड़ी डोपिंग के फंदे में फंसे पाए जाते हैं।

चाहे वे एशियाई खेल हों या फिर ओलंपिक, तमाम देशों के होनहार खिलाड़ियों को इस कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ता है और हर बार कुछ खिलाड़ी डोपिंग परीक्षण पास न कर पाने के कारण खेलों में हिस्सा लेने से रह जाते हैं। दरअसल, दुनिया भर में डोपिंग को लेकर एक आचार संहिता बनी हुई है, जिसका सभी देशों को पालन करना पड़ता है। इसमें कई ऐसी दवाएं लेने पर प्रतिबंध है, जिनसे खिलाड़ी का रक्त संचार तेज हो जाता है, वह कुछ अधिक ताकत महसूस करने लगता है और उसकी खेलने की क्षमता बढ़ जाती है।

मगर अक्सर देखा जाता है कि जिन खिलाड़ियों को अपनी प्रदर्शन क्षमता पर कुछ संदेह होता है, वे ऐसी जोशवर्द्धक दवाएं चुपके से ले लेते हैं। कई बार उनके प्रशिक्षक भी उन्हें ऐसी दवाएं लेने को कहते हैं। फिर जब डोपिंग जांच में मामला सामने आता है तो वे तरह-तरह की दलीलों के जरिए बचने का प्रयास करते हैं कि जुकाम-खांसी-बुखार वगैरह के चलते उन्हें ऐसी दवाएं लेनी पड़ीं। रूस में खिलाड़ियों के जोशवर्द्धक दवाएं लेने पर प्रतिबंध नहीं है। इसलिए ओलंपिक महासंघ ने वहां के खिलाड़ियों पर प्रतिबंध लगा रखा है। अगर भारत की राष्ट्रीय डोपिंग निरोधक एजंसी यानी नाडा इस मामले में काफी सजग और सख्त है। नरसिंह यादव के खून में अगर ऐसा तत्व मिला है जो डोपिंग निरोधक नियमों के तहत प्रतिबंधित है, तो वह उन्हें ओलंपिक में हिस्सा लेने की इजाजत शायद ही दे।

ओलंपिक में हिस्सेदारी के लिए नरसिंह यादव का चुनाव शुरू से विवादों में घिरा रहा। चौहत्तर वर्ग किलोग्राम भार वर्ग में दोहरा ओलंपिक पदक जीतने वाले सुशील कुमार की जगह जब उन्हें भेजने का फैसला किया गया तो सुशील कुमार ने कड़ी आपत्ति दर्ज की। यहां तक कि उन्होंने अदालत का दरवाजा भी खटखटाया। अब वही नरसिंह यादव अगर ओलंपिक में पदक हासिल करने के लिए जोशवर्द्धक दवाएं लेते पाए गए हैं तो उन लोगों को एक बार फिर अंगुली उठाने का मौका मिल गया है जो सुशील कुमार के समर्थन में थे। जिस तरह नरसिंह यादव के चयन को लेकर देशभर में माहौल बना उससे निसंदेह उन पर पदक लाने का मानसिक दबाव होगा।

क्या पता इससे उनका आत्मविश्वास कुछ डिगा हो। उनके प्रशिक्षक की प्रतिष्ठा भी दांव पर होगी। इसलिए दवाओं के जरिए यादव ने अपनी क्षमता बढ़ाने की कोशिश की हो। अगर ऐसा है तो यह नहीं भूलना चाहिए कि ओलंपिक खेलों के दौरान अगर परीक्षण में बाहर हो गए तो न सिर्फ उनकी बल्कि पूरे देश की किरकिरी होगी। आखिर कृत्रिम ताकत के सहारे पदक जीत लेना उनका कौन सा कौशल माना जाएगा। खेल प्रशिक्षकों को भी सोचना चाहिए कि धोखे से किसी खिलाड़ी को पदक की प्रतिस्पर्धा में शामिल कराने से बेहतर है कि उसकी वास्तविक क्षमता को पहचाना और विकसित किया जाए।

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