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संपादकीयः ममता की छांव

एक सभ्य समाज अपनी भावी पीढ़ियों की बेहतर जीवन-दशा के साथ-साथ उनके स्वस्थ और संवेदनशील व्यक्तित्व के विकास को ध्यान में रख कर नियम-कायदे बनाता है।

Author August 13, 2016 2:54 AM

एक सभ्य समाज अपनी भावी पीढ़ियों की बेहतर जीवन-दशा के साथ-साथ उनके स्वस्थ और संवेदनशील व्यक्तित्व के विकास को ध्यान में रख कर नियम-कायदे बनाता है। गुरुवार को प्रसूति प्रसुविधा (संशोधन) विधेयक, 2016 को राज्यसभा में जैसा व्यापक समर्थन मिला उससे जाहिर है कि लोकसभा में भी इसमें कोई बाधा नहीं आएगी। संशोधन विधेयक लाने की जरूरत इसलिए पड़ी कि 1961 में बने कानून में बारह हफ्तों के मातृत्व अवकाश का प्रावधान है, लेकिन इसे नवजात शिशु की देखभाल के लिए अपर्याप्त माना जाता है।

नया कानून बनने के बाद कोई महिला अपनी नौकरी की जगह पर वेतन समेत सभी सुविधाओं के साथ प्रसव के लिए छब्बीस हफ्ते यानी साढ़े छह महीने का मातृत्व अवकाश ले सकेगी। विधेयक में दस से ज्यादा कर्मचारियों वाली सभी कंपनियों और संस्थाओं को कानून के दायरे में लाने, पचास से ज्यादा कर्मचारी होने की स्थिति में बच्चों के लिए क्रेच की व्यवस्था मुहैया कराने सहित गोद लेने वाली कामकाजी महिलाओं को भी यह सुविधा मिलने के प्रावधान शामिल किए गए हैं। जाहिर है, यह स्त्री के हक में एक और अहम कदम है। सरकारी महकमों में प्रस्तावित कानून के अमल में शायद कोई दिक्कत न आए। लेकिन मातृत्व अवकाश के मसले पर निजी कंपनियों का आम रवैया सराहनीय नहीं रहा है, लिहाजा प्रस्तावित कानून के लागू होने की असली चुनौती वहीं होगी।

यों भी, सरकारी क्षेत्र में सिमटते रोजगार के दौर में नौकरी के लिए निजी क्षेत्र पर निर्भरता बढ़ती गई है। फिर, असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए तो मातृत्व अवकाश का अधिकार अभी दूर का सपना ही है। संगठित क्षेत्र की ज्यादातर निजी कंपनियों के रुख का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अगर वहां कोई महिला प्रसव और शुरुआती महीनों में बच्चे की देखरेख के लिए अवकाश की मांग करती है तो मौजूदा कानूनी सुविधा देने के बजाय कई बार दूसरे बहानों को आधार बना कर उसे नौकरी छोड़ने तक के लिए मजबूर कर दिया जाता है। ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं। अलबत्ता कोई कंपनी घोषित तौर पर ऐसा नहीं करती। लेकिन किसी महिला का गर्भवती होना या इसकी संभावना भी उसके नौकरी हासिल करने की राह में बाधा है। जबकि कई देशों में बेहतर मातृत्व अवकाश की व्यवस्था करना गर्व का विषय समझा जाता है।

मगर भारत में मातृत्व अवकाश को लेकर निजी कंपनियों का व्यवहार हैरान कर देने वाला होता है। क्या कोई व्यक्ति या समूह अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से इस हद तक विमुख हो सकता है कि वह एक बेहतर भावी पीढ़ी तैयार करने में अपनी मानवीय और जरूरी भूमिका निभाने के बजाय अपने मुनाफे को तरजीह दे! भारत में महिलाओं के नौकरी हासिल करने और नौकरी करने की स्थितियां पहले ही कई तरह की बाधाओं से भरी रही हैं। एसोचैम के एक सर्वेक्षण के मुताबिक एक चौथाई से ज्यादा महिलाएं बच्चा होने के बाद उसके लालन-पालन के लिए अपना कॅरियर छोड़ देती हैं। ऐसे में मातृत्व अवकाश में बढ़ोतरी की व्यवस्था बेशक उन्हें अपने व्यक्तित्व को मजबूत करने के साथ-साथ देश की श्रमशक्ति में उनकी हिस्सेदारी को बनाए रखने में मददगार होगी। लेकिन बच्चे पालने में पिता की भूमिका बढ़ाए बगैर बराबरी के मकसद से हासिल यह उपलब्धि अधूरी रहेगी।

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