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संपादकीयः आपराधिक लापरवाही

तभी किसी विषय को लेकर आपरेशन करने के लिए तैनात किए गए दो चिकित्सक सारी आचार संहिता और नियम-कायदे ताक पर रख कर आपस में तू-तू, मैं-मैं पर उतर आए और गाली-गलौज करने लगे।

Author September 1, 2017 2:27 AM

इलाज हो या आॅपरेशन, चिकित्सकों की आपराधिक लापरवाही कोई नई बात नहीं है। कभी गलत इलाज करके मरीज को मौत के घाट उतार देने तो कभी आॅपरेशन के दौरान शरीर में ही तौलिया या कोई उपकरण छोड़ देने की घटनाएं अक्सर सुनाई पड़ती हैं। चिकित्सीय लापरवाही के जाने कितने मामले न्यायालयों और उपभोक्ता फोरमों में फैसले की राह देख रहे हैं। लेकिन मंगलवार को राजस्थान के जोधपुर स्थित सरकारी उम्मेद चिकित्सालय में जो कुछ हुआ, उसकी दूसरी मिसाल मुश्किल है। दो चिकित्सकों की आपसी कहासुनी ने एक नवजात शिशु की जान ले ली। चिकित्सकों के प्रति आम आदमी का जो विश्वास होता है, इस घटना से उसे तगड़ा झटका लगा है। गौरतलब है कि चिकित्सालय में एक गर्भवती महिला को प्रसव के लिए भर्ती किया गया था। उसे आॅपरेशन थिएटर में ले जाया गया और आॅपरेशन की सारी तैयारियां भी पूरी कर ली गर्इं।

तभी किसी विषय को लेकर आपरेशन करने के लिए तैनात किए गए दो चिकित्सक सारी आचार संहिता और नियम-कायदे ताक पर रख कर आपस में तू-तू, मैं-मैं पर उतर आए और गाली-गलौज करने लगे। उनका यह मौखिक विवाद करीब एक घंटे तक चला। इस दौरान महिला कराहती हुई आॅपरेशन का इंतजार ही करती रही। अस्पताल के दूसरे कर्मचारी भी मौके पर मौजूद थे। नतीजा यह रहा कि आपरेशन एक घंटे बाद शुरू हो पाया और इसी देरी की वजह से पेट में ही शिशु की मौत हो गई। विचारणीय यह है कि जिस आपरेशन थिएटर में मामूली आवाज करने की भी मनाही होती है और आपसी बातचीत भी इशारों में की जाती है, ताकि मरीज को कोई असुविधा न हो और चिकित्सकों का भी अपने काम से ध्यान-भंग न हो, ऐसी जगह को ‘मैदाने-जंग’ बना देना किस तरह का पेशेवर सलीका है? असल में यह ऐसी लापरवाही नहीं है, जो अनजाने में हो जाती है। दोनों चिकित्सक देख रहे थे कि मरीज आपरेशन टेबल पर पड़ी है, फिर भी वे लड़ाई-झगड़े में उलझे थे और आपरेशन का समय बीतता जा रहा था। इसलिए इस लापरवाही की गंभीरता बहुत बढ़ जाती है। किसी ने इस घटना का वीडियो भी बना लिया और वह सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

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हालांकि राज्य सरकार ने इस मामले में एक चिकित्सक को बर्खास्त तथा दूसरे को निलंबित कर दिया गया है और जांच के लिए एक समिति बना दी है। राजस्थान महिला आयोग ने भी अस्पताल प्रशासन से जवाब तलब किया है। मगर काबिलेगौर यह भी है कि महिला आयोग की दिलचस्पी इसमें भी दिख रही है कि विवाद का वीडियो किसने बनाया, जबकि हकीकत यह है कि थोड़ी-बहुत जो कार्रवाई मुमकिन हो पाई है, वह इसी वजह से हो सकी है। ऐसे में गुनाह की जांच करने के बजाय गुनाह को सार्वजनिक करने वाले की तलाश करना, कहीं न कहीं आयोग की मंशा पर भी सवाल खड़ा करता है। असल में, ये सब सांप निकल जाने के बाद लकीर पीटने की कवायदें भर हैं। विडंबना तो यह है कि बच्चे को बचाया नहीं गया। क्या इसे आपराधिक लापरवाही मान कर इन दोषियों के खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए? क्या उन्हें निलंबित या बर्खास्त कर देने भर से उनकी सजा पूरी हो जाती है! यह असंवेनदनशीलता और लापरवाही, दोनों की इंतिहा है।

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