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संपादकीयः अब पलटी

जब जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त किया गया, तो घाटी में अशांति की आशंका के मद्देनजर कर्फ्यू लगा दिया गया। राजनेताओं के राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने पर पाबंदी लगा दी गई। कई विपक्षी नेताओं को उनके घर में ही रखा गया। जब यह स्थिति लंबी खिंचने लगी तो विपक्षी दलों ने शोर मचाना शुरू किया कि इस तरह घाटी के लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है।

Author Updated: October 11, 2019 2:38 AM
महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला। (फाइल फोटो)

जब से जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटा है, कांग्रेस लगातार सरकार का विरोध कर रही है। मगर वह ऊपर से यह भी दिखाने का प्रयास करती रही है कि लोकतंत्र में उसका पूरा भरोसा है। यही वजह है कि जब वहां ब्लाक विकास परिषद यानी बीडीसी के चुनाव की घोषणा हुई तो उसने उसमें हिस्सा लेने का एलान कर दिया। मगर अब उसने इन चुनावों का बहिष्कार करने का फैसला किया है। उसका तर्क है कि सरकार लगातार उसके नेताओं को नजरबंदी में रखे हुई है और उन पर तरह-तरह की पाबंदियां लगा कर परेशान कर रही है, इसलिए वह बीडीसी चुनावों का बहिष्कार करेगी। उसका कहना है कि नजरबंदी के चलते उसके नेता चुनाव की अपेक्षित तैयारियां नहीं कर पाए, सरकार ने इरादतन ऐसा किया ताकि उसकी पार्टी चुनाव जीत जाए। गौरतलब है कि जब बीडीसी चुनावों की घोषणा हुई थी, तो कांग्रेस ने पैंथर्स पार्टी के साथ मिल कर चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया था। हैरानी की बात है कि तब उसे ऐसा नहीं लगा कि उसके नेता अपेक्षित तैयारी नहीं कर पाए हैं। अगर वास्तव में उसे नजरबंदी पर एतराज था तो वह अपने उस मुद्दे पर अड़ी रहती। यह क्या कि लोकतांत्रिक भी दिखना चाहती है और चुनावों का विरोध भी कर रही है।

जब जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त किया गया, तो घाटी में अशांति की आशंका के मद्देनजर कर्फ्यू लगा दिया गया। राजनेताओं के राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने पर पाबंदी लगा दी गई। कई विपक्षी नेताओं को उनके घर में ही रखा गया। जब यह स्थिति लंबी खिंचने लगी तो विपक्षी दलों ने शोर मचाना शुरू किया कि इस तरह घाटी के लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। इससे संबंधित शिकायतें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी पहुंचीं। हालांकि उन शिकायतों का कोई उल्लेखनीय असर नहीं हुआ। फिर केंद्र ने स्थितियों को देखते हुए चरणबद्ध तरीके से कर्फ्यू में ढील देनी शुरू की, विपक्षी नेताओं पर से पाबंदियां हटानी शुरू कर दी। पहले जम्मू संभाग के नेताओं को मुक्त किया गया, फिर कश्मीरी नेताओं पर से कुछ पाबंदियां हटाई गर्इं, जिसके तहत नेशनल कान्फ्रेंस के नेता आपस में मिल कर विचार-विमर्श भी कर चुके हैं। धीरे-धीरे जनजीवन सामान्य हो रहा है। दुकानें खुलने लगी हैं, लोग दफ्तर लौटने लगे हैं, स्कूल खुलने लगे हैं। इस तरह मौलिक अधिकारों के दमन की बात काफी हद तक बेमानी नजर आने लगी है। फिर भी कांग्रेस की चुनावों में हिस्सा न लेने की घोषणा हैरान करने वाली है।

सरकार की नीतियों, उसके फैसलों पर असहमति दर्ज कराना विपक्षी दलों का धर्म है, पर चुनावों में हिस्सा न लेने का उनका फैसला एक तरह से उनके लोकतंत्र में अविश्वास को ही रेखांकित करता है। विशेष दर्जा हटने के बाद यह जम्मू-कश्मीर में पहला चुनाव है। इससे न सिर्फ लोगों को अपने मताधिकार का प्रयोग करने का मौका मिल रहा है, बल्कि इससे उनके भरोसे को भी बढ़ाने में मदद मिलेगी। लिहाजा, सभी राजनीतिक दलों से स्वाभाविक अपेक्षा की जाती है कि ऐसे नाजुक मसलों पर एकजुटता जाहिर करें। फिलहाल कश्मीरी लोगों का हौसला बढ़ाने का समय है। इसके लिए जरूरी है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बहाल किया जाए। यह तभी संभव है, जब अपने राजनीतिक स्वार्थों को अलग रख कर मुख्यधारा की सभी पार्टियां चुनावों में शिरकत करें। कांग्रेस के ताजा फैसले से उसमें अवरोध ही उत्पन्न होगा।

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