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संपादकीयः महंगाई की मार

सवाल यह है कि महंगाई पर सरकार काबू पाने के लिए उपाय क्या कर रही है? देश में इतनी ज्यादा महंगाई तब है जब पिछले सात महीनों से कच्चे तेल के दाम नहीं बढ़े हैं और पेट्रोल-डीजल के दाम एक तरह से स्थिर बने हुए हैं। लोग महंगाई से इसलिए भी त्रस्त हैं कि आबादी के बड़े तबके के पास जरूरी खर्च तक के पैसे नहीं हैं।

Author Published on: February 15, 2020 3:09 AM
मामला सिर्फ महंगाई तक ही सीमित नहीं है। एनएसओ ने औद्योगिक उत्पादन के जो आंकड़े बताए हैं, वे और चिंताजनक हैं। पिछले साल दिसंबर में औद्योगिक उत्पादन में 0.3 फीसद की गिरावट दर्ज की गई।

खुदरा और थोक मुद्रास्फीति के अब जो आंकड़े आए हैं, वे किसी बुरी खबर से कम नहीं है। जनवरी में भी महंगाई रिकार्डतोड़ स्तर पर बनी रही। रोजमर्रा के उपयोग वाली चीजों और खाने-पीने के सामान के दाम जिस तेजी से बढ़ते जा रहे हैं, उससे लोगों का जीना मुहाल हो गया है। हाल में बिना सबसिडी वाला रसोई गैस सिलेंडर के दाम डेढ़ सौ रुपए बढ़ा दिए गए। पिछले छह साल में एलपीजी के दाम में यह सबसे ज्यादा बढ़ोतरी है। करोड़ों परिवार हैं जो बिना सबसिडी वाला रसोई गैस सिलेंडर उपयोग करते हैं। उनके लिए यह कोई मामूली बोझ नहीं है।

इससे पहले कई महीने तक प्याज ने लोगों के आंसू निकाले थे। ऐसे में लोगों के पास कमरतोड़ महंगाई को झेलने के अलावा कोई चारा भी नहीं है। लोग सस्ते और अच्छे दिन की उम्मीद में वक्त गुजारने को मजबूर हैं। हालांकि इस बात के संकेत आ रहे हैं कि आने वाले दिनों में महंगाई से थोड़ी राहत मिल सकती है, पर उतनी नहीं जितनी लोग उम्मीद कर रहे हैं। हाल में रिजर्व बैंक ने भी नीतिगत दरों में कटौती इसीलिए नहीं की थी कि कहीं महंगाई का ग्राफ और न चढ़ जाए। जाहिर है, रिजर्व बैंक को निकट भविष्य में महंगाई कम होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। बढ़ती महंगाई बता रही है कि उस पर काबू पानेमें सरकार लाचार ही है।

राष्ट्रीय सांख्यिकीय संगठन (एनएसओ) के आंकड़े बता रहे हैं कि जनवरी में दालों, सब्जियों और मांस-मछली जैसे खाद्य पदार्थों के दाम चढ़ने से खुदरा महंगाई बढ़ी है। जनवरी में महंगाई दर 7.59 फीसद थी, जबकि पिछले साल दिसंबर में यह 7.35 फीसद दर्ज की गई थी, और दिसंबर 2018 में यह आंकड़ा मात्र 1.97 फीसद था। इससे यह साफ है कि बारह महीनों में 5.38 फीसद महंगाई बढ़ी है, जो साढ़े पांच साल साल में सबसे ज्यादा है। पर यह सिलसिला थम नहीं रहा और खुदरा महंगाई का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय की ओर से जारी थोक महंगाई के आंकड़े भी नींद उड़ाने वाले हैं। थोक मुद्रास्फीति जनवरी में 3.1 फीसद, जबकि दिसंबर में यह 2.59 फीसद रही थी और इसका सबसे कारण प्याज और आलू के दाम बढ़ना रहा। महंगाई चाहे थोक हो या खुदरा, पैसा तो उपभोक्ताओं की जेब से ही निकलता है। यही चिंता का विषय है।

मामला सिर्फ महंगाई तक ही सीमित नहीं है। एनएसओ ने औद्योगिक उत्पादन के जो आंकड़े बताए हैं, वे और चिंताजनक हैं। पिछले साल दिसंबर में औद्योगिक उत्पादन में 0.3 फीसद की गिरावट दर्ज की गई। जबकि संसद में बजट प्रस्तावों पर चर्चा के दौरान वित्त मंत्री ने अर्थव्यवस्था में सुधार के दावे करते हुए कहा कि अब सब ठीक हो रहा है और औद्योगिक उत्पादन ने भी रफ्तार पकड़ी है। एनएसओ के आंकड़े सरकार के दावों की हकीकत को उजागर करने के लिए काफी हैं। सरकार बार-बार दावा कर रही है कि अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है और यह गिरावट थोड़े वक्त की है।

सवाल यह है कि महंगाई पर सरकार काबू पाने के लिए उपाय क्या कर रही है? देश में इतनी ज्यादा महंगाई तब है जब पिछले सात महीनों से कच्चे तेल के दाम नहीं बढ़े हैं और पेट्रोल-डीजल के दाम एक तरह से स्थिर बने हुए हैं। लोग महंगाई से इसलिए भी त्रस्त हैं कि आबादी के बड़े तबके के पास जरूरी खर्च तक के पैसे नहीं हैं। पिछले एक साल में जिस तरह से लोगों की नौकरियां गई हैं, उसने संकट को और बढ़ा दिया है। ऐसे में लोगों के पास पैसा ही नहीं होगा तो महंगाई से कैसे पार पाएंगे।

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