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संपादकीयः किसान का गुस्सा

अभी दो दिन पहले आए सरकारी आंकड़ों ने बताया कि नोटबंदी के चलते कुल जीडीपी वृद्धि दर में तो गिरावट आई, पर कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन शानदार रहा। निश्चय ही इसका श्रेय अच्छे मानसून के साथ-साथ किसानों को भी जाता है।

Author June 3, 2017 2:37 AM
प्रतीकात्मक चित्र

अभी दो दिन पहले आए सरकारी आंकड़ों ने बताया कि नोटबंदी के चलते कुल जीडीपी वृद्धि दर में तो गिरावट आई, पर कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन शानदार रहा। निश्चय ही इसका श्रेय अच्छे मानसून के साथ-साथ किसानों को भी जाता है। लेकिन उनकी मेहनत का कैसा फल मिला? इसका जवाब जानना हो तो महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में शुरू हुए किसान आंदोलन पर नजर डाल सकते हैं। महाराष्ट्र के किसान जहां कर्जमाफी की मांग कर रहे हैं वहीं इंदौर व उज्जैन समेत मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों के किसानों ने उपज के न्यायसंगत मूल्य की मांग उठाई है। दोनों राज्यों में किसान आंदोलन का नेतृत्व कोई एक संगठन नहीं कर रहा है। दरअसल, अभी देश में कोई इतना बड़ा तथा प्रभावी किसान संगठन है भी नहीं, जो एक से ज्यादा राज्यों को, या किसी एक बड़े राज्य को भी झकझोर कर रख दे। महाराष्ट्र में भी, और मध्यप्रदेश में भी, आंदोलन तमाम किसान संगठनों के साझा मोर्चे के बल पर ही संभव हो सका है। दोनों जगह आंदोलन के तरीके में एक बात सामान्य है, शहरों को दूध और सब्जियों की आपूर्ति ठप करने का प्रयास। इस सिलसिले में कई जगह सड़कों पर सैकड़ों लीटर दूध बहा दिया गया, तो कई जगह सब्जियां बिखेर दी गर्इं। किसानों ने अपने को कृषि-कार्य से विरत रखने यानी हड़ताल की भी घोषणा की है।

दूध बहा देने और सब्जियां बिखेर देने पर बहुत-से लोगों को आपत्ति हो सकती है। इनकी आपूर्ति रोकने के त्रासद परिणाम गिनाए जा सकते हैं। पर किसान ऐसा समुदाय नहीं है जो हर छोटी-मोटी शिकायत लेकर आंदोलन पर उतारू हो जाए। इसके विपरीत, वे बहुत धैर्यशील होते हैं और यह उनके धीरज का ही प्रमाण है कि खेती के लगातार घाटे का धंधा बनते जाने, कई बार सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य भी न मिलने, कई बार लागत तक न निकल पाने और पिछले ढाई दशक में तीन लाख से ज्यादा किसानों के खुदकुशी कर लेने के बावजूद किसान कुल मिलाकर खामोश ही रहे हैं। क्या पता, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश से उठी क्षोभ की लहर भी कुछ दिनों में शांत पड़ जाए, पर यह भी हो सकता है कि दूसरे राज्यों के किसानों के लिए यह प्रेरक साबित हो। इससे पहले तमिलनाडु के किसानों ने दिल्ली आकर जंतर-मंतर पर लंबा धरना दिया था, पर सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगी थी। जहां सत्ता ऐसी संवेदनहीनता और उदासीनता का परिचय दे, वहां लोग थोड़ा उग्र तरीके अपनाने को सोचें, तो इसमें क्या आश्चर्य! पर यह गौरतलब है कि दोनों राज्यों में किसानों ने ऐसी मांग उठाई है जिन्हें भाजपा भी सही मानती है। उत्तर प्रदेश में किसानों के कर्ज माफ करने का वादा पार्टी ने और प्रधानमंत्री ने भी किया था। वहां सरकार बनने पर कर्जमाफी की घोषणा भी की गई। अलबत्ता व्यवहार में यह अब तक लागू नहीं हो पाई है।

भाजपा ने उत्तर प्रदेश के किसानों को जो राहत देने का वादा किया था, वही राहत तो महाराष्ट्र के किसान अपने लिए मांग रहे हैं! और दोनों जगह भाजपा की ही सरकार है! फिर, कर्जमाफी की मांग एक ऐसे राज्य में उठी है जहां किसान आत्महत्या की सबसे ज्यादा घटनाएं हुई हैं। भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में अपने घोषणापत्र में वादा किया था कि अगर वह सत्ता में आई तो किसानों को उनकी उपज का डेढ़ गुना दाम दिलाएगी, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करेगी। मध्यप्रदेश के किसान वही तो मांग रहे हैं जिसका भाजपा ने वादा किया था! फिर भाजपा खामोश क्यों है? हमारे प्रधानमंत्री जब-तब किसानों को उनकी आय दुगुनी हो जाने का सपना दिखाते रहते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य भी वे नहीं दिलवा पा रहे हैं। जबकि स्पष्ट बहुमत से सत्ता में आए उन्हें तीन साल हो गए हैं।

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