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संपादकीयः जीएसटी की राह

कर-ढांचे में थोड़े-बहुत फेरबदल समय-समय पर होते रहे हैं। मगर जीएसटी कर-प्रणाली में सुधार की अब तक की सबसे बड़ी तजवीज है। इस पर लगभग एक दशक से चर्चा होती रही है।
Author July 29, 2016 03:15 am
जीएसटी विधेयक (वस्तु एवं सेवा कर)

कर-ढांचे में थोड़े-बहुत फेरबदल समय-समय पर होते रहे हैं। मगर जीएसटी कर-प्रणाली में सुधार की अब तक की सबसे बड़ी तजवीज है। इस पर लगभग एक दशक से चर्चा होती रही है। लेकिन राज्यों की आपत्तियों के कारण संबंधित विधेयक अधर में ही रहा। अब पहली बार तमाम दलों और राज्यों की आम सहमति बनती दिख रही है। उम्मीद है कि मानसून सत्र में ही इस पर संसद की मुहर लग जाएगी। जीएसटी क्यों इतना अहम है? क्योंकि जीएसटी के तौर पर जो कर-प्रणाली वजूद में आएगी उससे अप्रत्यक्ष करों की दरों में एकरूपता आने, व्यापार की सहूलियतें बढ़ने और फलस्वरूप अर्थव्यवस्था को और गति मिलने की उम्मीद की जा रही है। प्रस्तावित व्यवस्था में केंद्रीय बिक्री कर, उत्पाद शुल्क, सीमा शुल्क, राज्यों का वैट और अन्य अप्रत्यक्ष करों को हटा कर सिर्फ एक टैक्स लागू किया जाएगा, जो कि वस्तु एवं सेवा कर होगा। उम्मीद है कि सभी राज्यों में कर की दर समान होने से कारोबार में आसानी होगी।

फिर, क्या वजह है कि इसके लिए आम सहमति नहीं बन पा रही थी? यूपीए सरकार इसकी तोहमत भाजपा की राज्य सरकारों पर मढ़ती थी और केंद्र की कमान भाजपा के हाथ आई तो उसने गतिरोध के लिए कांग्रेस को कसूरवार ठहराना शुरू किया। लेकिन असल दिक्कत राज्यों की तरफ से थी, क्योंकि उन्हें यह आशंका सताती रही है कि जीएसटी लागू होने से उन्हें राजस्व का नुकसान होगा। फिर, और भी ज्यादा अंदेशा उन राज्यों को रहा है जो मैन्युफैक्चरिंग में आगे हैं, क्योंकि जीएसटी अंतिम बिंदु यानी उपभोक्ता के स्तर पर लगना है। लिहाजा, जीएसटी का रास्ता साफ करने के लिए केंद्र सरकार को संभावित नुकसान की भरपार्ई के मामले में और झुकना पड़ा।

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने विधेयक के जिस संशोधित मसविदे को मंजूरी दी है उसके मुताबिक राज्यों को पांच साल तक पूर्ण क्षतिपूर्ति की गारंटी दी गई है। जबकि पहले के मसविदे में, नुकसान की भरपाई तीन साल तक सौ फीसद, चौथे साल पचहत्तर फीसद और पांचवें साल पचास फीसद करने का प्रावधान था। नुकसान की शत-प्रतिशत भरपाई का प्रावधान पांच साल के लिए करने के अलावा, अंतर-राज्यीय व्यापार पर एक फीसद अतिरिक्त कर को हटाने की अधिकतर राज्यों की मांग भी केंद्र ने मान ली है। अलबत्ता जीएसटी की अधिकतम दर तय करने के मामले में स्थिति अब भी साफ नहीं है।

गौरतलब है कि कांग्रेस लगातार यह मांग उठाती रही है कि जीएसटी की अधिकतम दर विधेयक में तय हो। लेकिन चूंकि यह संविधान संशोधन विधेयक है, इसलिए सरकार इस मामले में और भी हिचकती रही है, क्योंकि फिर दरों की अधिकतम सीमा में बदलाव की जरूरत महसूस होने पर संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत जुटाने की जहमत उठानी होगी। दूसरे प्रावधानों पर केंद्र सरकार के नरम रुख अख्तियार करने के बाद अब दरों की अधिकतम सीमा तय करने पर कांग्रेस के तेवर पहले जैसे नहीं रह गए हैं। पिछले दिनों जीएसटी पर हुई राज्यों के वित्तमंत्रियों की बैठक में किसी भी कांग्रेस-शासित राज्य ने कोई एतराज नहीं उठाया। जीएसटी के लिए बंगाल और बिहार के भी रजामंद होने के साथ ही अधिकतर राज्यों के समर्थन में होने से विधेयक के कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं से पारित होने की शर्त भी पूरी हो जाने की उम्मीद है। अलबत्ता जीएसटी को लेकर यह संतुलन बिठाने की चुनौती अब भी बनी हुई है कि इसकी दर क्या हो कि राजस्व संग्रह भी बढ़े और आम लोगों को परेशानी भी न हो।

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