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संपादकीयः सहूलियत की दर

जीएसटी लागू करने के पीछे सरकार का इरादा था कि इससे राज्यों की तरफ से लगने वाले अनेक करों से उत्पादकों और उपभोक्ताओं को मुक्ति मिलेगी। इस तरह वस्तुओं की कीमतें घटेंगी और कारोबार में सुगमता आएगी, मगर अभी तक जीएसटी की उलझनें समाप्त नहीं हुई हैं।

GSTतस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है।

वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी को लागू हुए करीब ढाई साल हो गए। अब तक इसमें थोड़े-थोड़े अंतराल पर कई बार बदलाव किए जा चुके हैं। इसके बावजूद करों में कटौती की मांग उठती रहती है। इसकी एक वजह यह है कि जीएसटी में करों के चार ढांचे रखे गए हैं- पांच, बारह, अठारह और अट्ठाई फीसद। जिन वस्तुओं पर कर की दर अट्ठाईस फीसद रखी गई है, उसे घटाने की मांग उठती रहती है। शुरुआत में कुछ वस्तुओं पर कर की दरें बहुत ऊंची थीं, जिन्हें लेकर विवाद हुआ और उन्हें घटाना पड़ा। उनमें कई वस्तुएं कृषि क्षेत्र से भी जुड़ी थीं। पिछले काफी दिनों से माना जा रहा है कि जीएसटी की दरें स्थिर हो चुकी हैं, पर इनमें कटौती की मांग रह-रह कर उठती रहती है। इसका असर यह भी पड़ा है कि जीएसटी का संग्रह अनुमानित लक्ष्य तक नहीं पहुंच पा रहा है, जबकि राज्यों को केंद्र की तरफ से मिलने वाले करों के अंशदान का दबाव बना हुआ है। इस समस्या से पार पाने के लिए नीति आयोग के एक सदस्य ने सुझाव दिया है कि जीएसटी के कर ढांचे में बार-बार बदलाव उचित नहीं है, अगर जरूरत पड़े, तो इस पर साल में एक बार विचार किया जाना चाहिए। फिर कर ढांचों के चार के बजाय दो ही व्यावहारिक स्तर होने चाहिए। इसका मकसद कर संग्रह को बढ़ाना होना चाहिए। देखना है, इस पर जीएसटी परिषद कहां तक अमल करती है।

जीएसटी लागू करने के पीछे सरकार का इरादा था कि इससे राज्यों की तरफ से लगने वाले अनेक करों से उत्पादकों और उपभोक्ताओं को मुक्ति मिलेगी। इस तरह वस्तुओं की कीमतें घटेंगी और कारोबार में सुगमता आएगी, मगर अभी तक जीएसटी की उलझनें समाप्त नहीं हुई हैं। इसे लागू करने के तीन साल बाद करों में स्थिरता आने और कारोबारियों, केंद्र और राज्य सरकारों को लाभ मिलने लगने की उम्मीद जताई गई थी। जिन भी देशों में जीएसटी लागू किया गया, वहां के यही अनुभव रहे कि इससे राज्यों को होने वाले नुकसान तीन साल के बाद बंद हो गए थे। मगर हमारे यहां तीन साल होने को आ रहे हैं और जीएसटी को लेकर उलझनें ही दूर नहीं हो पाई हैं। बार-बार करों में बदलाव से कारोबारियों की उलझनें तो बढ़ती ही हैं, राजस्व पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। ऐसे में कर ढांचों को लेकर एक बार अंतिम रूप से विचार करने और उनके ढांचे चार के बजाय दो करने का सुझाव उचित ही है।

करों का निर्धारण वस्तुओं के उत्पादन, उपभोग और विभिन्न आयवर्ग के उपभोक्ताओं को ध्यान में रख कर किया जाता है। जिन वस्तुओं का उत्पादन अधिक होता है और जिनका उपभोक्ता वर्ग अधिक है, उन पर सामान्यतया कर की दरें कम रखी जाती हैं। कृषि और डेरी उत्पाद उन्हीं में आते हैं, जिनका उपभोग गरीब से लेकर अमीर वर्ग तक करता है। इसलिए इन पर कर की दर पांच फीसद रखा जाना उचित है। मगर जिन वस्तुओं और सेवाओं का उपभोग संपन्न और विशिष्ट वर्ग करता है या जिनके उत्पादन में विशेष तकनीक और प्रसंस्करण प्रविधि आदि का उपयोग होता है, जिन्हें विलासिता की वस्तुएं कहा जाता है, उन पर कर की दरें ऊंची रखी जाती हैं। इस तरह जब सभी परोक्ष कर समाहित होकर केंद्रीय कर में शामिल हो गए हैं, तब करों के चार ढांचे रखने का कोई तर्क नहीं है। इसे अंतिम रूप से व्यावहारिक बनाने की सलाह उचित है।

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