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संपादकीयः अनधिकृत कब्जा

विडंबना यह है कि जरूरत और कानून की कसौटी पर वस्तुस्थिति से परिचित होने के बावजूद सरकारी बंगलों में काबिज सांसदों को अपनी ओर से निर्धारित समय पर आवास खाली करना जरूरी नहीं लगता।

Author Published on: October 9, 2019 1:45 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

देश की राजधानी दिल्ली के केंद्र में स्थित सरकारी बंगलों में नियमों के विरुद्ध कब्जा जमाने की शिकायतें लंबे से कायम रही हैं। अक्सर ऐसी खबरें आती रहती हैं कि लोकसभा या राज्यसभा के सांसद अपनी सदस्यता की अवधि खत्म होने के बाद भी इन बंगलों को खाली करने में टालमटोल करते रहते हैं। ऐसे में नए चुने गए सांसदों को आवास मिलने में मुश्किल पेश आती है और फिर शिकायतों के दायरे का विस्तार होता है। पिछले कुछ दिनों से दिल्ली के लुटियंस जोन में स्थित सरकारी बंगलों को खाली कराने के लिए संबंधित महकमे की कोशिश जारी है और करीब सवा दो सौ पूर्व सांसदों से आवास खाली कराने की कार्रवाई शुरू की गई थी। लेकिन अब भी हालत यह है कि बार-बार नोटिस भेजने के बावजूद लगभग चालीस पूर्व सांसदों ने सरकारी बंगले खाली नहीं किए हैं। आखिर इन सांसदों के सामने किस तरह की मजबूरी है कि उन्हें आवास खाली करने में दिक्कत हो रही है? जबकि उन्हें खुद भी इस बात का अंदाजा होगा कि ऐसी स्थिति में प्रशासन कानूनन क्या कदम उठा सकता है!

विडंबना यह है कि जरूरत और कानून की कसौटी पर वस्तुस्थिति से परिचित होने के बावजूद सरकारी बंगलों में काबिज सांसदों को अपनी ओर से निर्धारित समय पर आवास खाली करना जरूरी नहीं लगता। शायद यही वजह है कि अब आवास व शहरी मामलों के मंत्रालय को पूर्व सांसदों के घर पुलिस की मदद से जबरन खाली कराने की कार्रवाई शुरू करनी पड़ी है। मंत्रालय के संपदा विभाग ने सरकारी आवास के आबंटन की पात्रता नहीं रखने वालों से बंगला खाली कराने के लिए हाल ही में संशोधित सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम के तहत सोमवार को सख्ती से बेदखली की प्रक्रिया शुरू की है।

इस मसले पर सांसदों की लापरवाही का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों लोकसभा की आवास समिति ने पूर्व सांसदों को सात दिनों के अंदर अपने आधिकारिक आवास खाली करने के निर्देश दिए थे और ऐसा नहीं करने की स्थिति में सांसदों के बंगले में बिजली, पानी और गैस कनेक्शन तीन दिन में काट लेने की बात कही थी। निश्चित रूप से यह एक अच्छी स्थिति नहीं है और संबंधित महकमों के सामने ऐसा करने की नौबत नहीं आनी चाहिए। लेकिन आखिर वे कौन-सी वजहें हैं कि नियम-कायदों से परिचित होने के बावजूद सांसदों को समय पर बंगला खाली करना जरूरी नहीं लगता है?

गौरतलब है कि अनधिकृत रूप से सरकारी आवासों के इस्तेमाल के मसले से निटपने के लिए नए कानून में प्रभावी प्रावधान किए गए हैं। यों आबंटन नियमों के मुताबिक आबंटी का कार्यकाल समाप्त होने के बाद आवास खाली नहीं करने पर उसे अनधिकृत कब्जे की श्रेणी में रखा जाता है। संशोधित कानून लागू होने से पहले की प्रक्रिया के तहत सरकारी आवास खाली कराने में पांच से सात सप्ताह का समय लगता था। लेकिन यह किसी से छिपा नहीं है कि अलग-अलग कारणों का हवाला देकर कई सांसद इससे काफी ज्यादा अवधि तक इन बंगलों में काबिज रहते थे। यों एक आदर्श स्थिति यह है कि अगर लोकसभा या राज्यसभा के किसी सांसद का कार्यकाल समाप्त होता है तो एक निर्धारित अवधि के बाद वह खुद ही उस आवास को खाली कर दे। लेकिन बहुत सारे सांसदों के मामले में वास्तविकता इससे इतर है। यह एक जनप्रतिनिधि के रूप में अपने राजनीतिक कद-पद का तो दुरुपयोग है ही, इससे खुद उनके बारे में समाज में गलत संदेश जाता है।

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