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संपादकीयः आसियान के साथ

पिछले दिनों संपन्न हुए जी-20 की तरह आसियान का शिखर सम्मेलन भी बिना किसी खास निर्णय के समाप्त हो गया।

Author September 10, 2016 2:33 AM

पिछले दिनों संपन्न हुए जी-20 की तरह आसियान का शिखर सम्मेलन भी बिना किसी खास निर्णय के समाप्त हो गया। दुनिया के महत्त्वपूर्ण बहुपक्षीय मंचों में आसियान की भी गिनती होती है। अलबत्ता यह जी-8, जी-20 या ब्रिक्स से भिन्न है, इस मायने में कि आसियान के सदस्य देश कारोबारी रिश्तों के अलावा भौगोलिक रूप से भी आपस में जुड़े हैं, यानी यह एक क्षेत्रीय मंच भी है। विएतनाम, फिलीपींस, थाईलैंड, सिंगापुर, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस जैसे दक्षिण पूर्व एशियाई देशों को मिला कर बना यह समूह आर्थिक एकीकरण के एक उदाहरण के तौर देखा जाता है। भारत ने जब कुछ साल पहले लुक ईस्ट नीति घोषित की थी, तो उसके मूल में आसियान से संबंध जोड़ने की ललक ही काम कर रही थी।

दूसरी तरफ आसियान को भारत में एक बड़ा बाजार दिखा और उसने इसका फायदा भी उठाया है। दक्षिण पूर्व एशिया में अपनी पहुंच बढ़ाने और शायद चीन के प्रभाव की काट के इरादे से अमेरिका, रूस व आस्ट्रेलिया भी किसी न किसी रूप में आसियान से नाता जोड़ चुके हैं। लिहाजा, जो आयोजन पहले केवल कारोबारी हितों की चर्चा तक सीमित रहता था, अब कूटनीतिक संदेश देने का भी अवसर हो गया है। इसलिए हैरानी की बात नहीं कि चौदहवें आसियान-भारत शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के भीतर से मदद पा रहे आतंकवाद की तरफ दुनिया का ध्यान खींचने की कोशिश की। पाकिस्तान का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि हमारे पड़ोस में एक देश है जो आतंकवाद पैदा करता है और उसका निर्यात करता है। इससे पहले चीन में हुए जी-20 के शिखर सम्मेलन में भी उन्होंने इसी आशय का वक्तव्य दिया था। भारत को इस बात का संतोष हो सकता है कि उसने आतंकवाद का मसला उठाने और पाकिस्तान को घेरने के लिए जी-20 की तरह आसियान के भी मंच का इस्तेमाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन आसियान के साथ व्यापार असंतुलन का मुद्दा उठाना मोदी क्यों भूल गए?

दूसरा सवाल यह है कि इस मौके पर खुद आसियान का हासिल क्या रहा? उसके सामने सबसे बड़ा मुद््दा दक्षिण चीन सागर में चीन के बेजा दावे से निपटना और सुचारु नौवहन सुनिश्चित करना है। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को छोड़ और किसी राष्ट्राध्यक्ष ने चीन को चेतावनी के लहजे में कुछ नहीं कहा। यों आसियान और पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन, दोनों के साझा बयानों में दक्षिण चीन सागर का जिक्र है, पर उनमें बस इतना कहा गया है कि ‘कुछ नेताओं’ ने इस मसले पर चिंता जाहिर की। यह दबा हुआ स्वर दक्षिण पूर्व एशिया में चीन के दबदबे की ओर ही इशारा करता है। यह हालत तब है जबकि करीब दो महीने एक अंतरराष्ट्रीय पंचाट दक्षिण चीन सागर पर चीन के अतिरंजित दावों को खारिज कर चुका है। यह मसला आसियान में कुछ सालों से रह-रह कर उठता रहा है। चीन कथित ऐतिहासिक हवाले देते हुए पूरे दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा जताता है और इस क्षेत्र के कई द्वीपों पर उसने हवाई पट््टी भी बना ली है। चीन के इस रवैए ने फिलीपींस, विएतनाम, मलेशिया और ब्रुनेई जैसे आसियान के सदस्य देशों के साथ खटास पैदा कर दी है। चीन ने अंतरराष्ट्रीय पंचाट के फैसले को ठेंगा दिखाने में तनिक देर नहीं की। लेकिन अब भी आसियान इस मामले में न तो खुलकर कुछ बोल रहा है न विवाद के संतोषजनक समाधान की कोई रणनीति बना पा रहा है।
नकी चर्चा क्यों नहीं हो रही?

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