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संपादकीयः दावे पर धुंध

सरकार ने नोटबंदी के पीछे एक मकसद यह भी बताया था कि इससे आतंकवाद पर लगाम लगेगी।

Author Published on: March 28, 2017 3:21 AM
अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने जब कहा था कि नोटबंदी का कदम न समझदारी भरा है और न मानवीय, तब नोटबंदी से कालाधान और भ्रष्टाचार मिटाने का राग आलापने वाले कुछ लोगों ने इसे महज मजाक बताया था।

सरकार ने नोटबंदी के पीछे एक मकसद यह भी बताया था कि इससे आतंकवाद पर लगाम लगेगी। नोटबंदी को, तमाम परेशानियों के बावजूद, कुल मिला कर भरपूर जन-समर्थन मिला तो इसकी वजह आतंकवाद से निजात मिलने की लोगों की उम्मीद भी थी। पर यह मकसद कहां तक सधा? केंद्र सरकार ने नोटबंदी के बाद जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों से जब्त की गई भारतीय मुद्रा की जानकारी देने से मना कर दिया है। एक आरटीआइ आवेदन के जरिए सरकार से इस संबंध में सूचना मांगी गई थी। सरकार ने जानकारी न देने का जो तर्क पेश किया है वह काफी लचर लगता है। उसने कहा है कि सूचनाधिकार अधिनियम-2005 जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता। केंद्रीय गृह मंत्रालय के जम्मू-कश्मीर प्रभाग का कहना था कि इस बारे में केंद्रीय जनसंपर्क अधिकारी के पास कोई जानकारी मौजूद नहीं है। अलबत्ता, जवाब में यह सलाह जरूर दी गई कि यह सूचना जम्मू-कश्मीर राज्य से संबंधित है और कोई चाहे तो सूचनाधिकार अधिनियम, 2009 के तहत जानकारी वहां से हासिल कर सकता है। जबकि केंद्र चाहता तो संबंधित जानकारी खुद वहां से मंगा सकता था।

प्रधानमंत्री ने घोषणा की थी कि नोटबंदी से न केवल काला धन और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा, बल्कि आतंकवादियों की आर्थिक कमर भी टूटेगी। लेकिन अब जब केंद्र सरकार आतंकवादियों के पास से जब्त की गई राशि की जानकारी देने में आनाकानी कर रही है तो कई दूसरे सवाल भी खड़े हो रहे हैं। यह बात भी समझ से परे है कि जब ऐसी जरूरी जानकारी केंद्र सरकार के पास नहीं है तो भला राज्य सरकार के पास क्यों होगी? अगर हुई भी तो क्या वह देना चाहेगी? जवाब न देने का एकऔर मामला भारतीय रिजर्व बैंक का है। आरबीआइ से आरटीआइ के तहत यह जानकारी मांगी गई कि आखिर भारतीयों को 31 मार्च 2017 तक नोट बदलने की अनुमति क्यों नहीं दी गई, जबकि शुरुआती घोषणा में प्रधानमंत्री ने खुद ऐसा वादा किया था। आरबीआइ ने यह कह कर कि सवाल, सूचनाधिकार कानून के अंतर्गत नहीं आता, जानकारी देने से मना कर दिया। नोटबंदी का नफा-हासिल क्या रहा, यह सरकार ने आज तक नहीं बताया।

वित्त मंत्रालय तो इस पर भी खामोशी अख्तियार किए हुए है कि नोटबंदी के बाद कुल कितनी राशि बैंकों में वापस आई, क्योंकि माना गया था कि बड़ी मात्रा में काला धन होने से उस तरह के लोग पैसा वापस जमा करने से कतराएंगे, जिसका लाभ आखिरकार सरकार को होगा। इस बारे में वित्त मंत्रालय ने चुप्पी क्यों साध रखी है? कमाल यह है कि एक तरफ रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय नोटबंदी की बाबत सही-सटीक जानकारी देने में हीलाहवाली कर रहे हैं और दूसरी तरफ नियंत्रक एवं महा लेखापरीक्षक (कैग) शशिकांत शर्मा ने कहा है कि वे नोटबंदी के प्रभाव का आकलन करेंगे और सरकार के राजस्व पर इसका क्या असर पड़ा, इसका भी हिसाब-किताब लगाएंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि कैग का आकलन सामने आने के बाद रहस्य का वह कुहासा कुछ छंटेगा जो सरकार की खामोशी से पैदा हुआ है।

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