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संपादकीयः आरक्षण का आधार

क्रीमी लेयर यानी ओबीसी आरक्षण की आय सीमा में पिछली बढ़ोतरी कांग्रेस या यूपीए सरकार ने ही की थी।

आयोग किन आंकड़ों के आधार पर उप-श्रेणियां बनाएगा? जातिवार जनगणना के आंकड़े सरकार ने जारी नहीं किए हैं।

बुधवार को केंद्र ने ओबीसी यानी पिछड़े वर्ग के आरक्षण की बाबत दो खास फैसले किए। एक, यह कि ओबीसी आरक्षण के लिए क्रीमीलेयर की सीमा बढ़ा कर आठ लाख रुपए कर दी। अभी तक यह छह लाख रुपए थी। क्रीमी लेयर में बढ़ोतरी कोई नई बात नहीं है। जब से क्रीमी लेयर का प्रावधान लागू हुआ तब से यानी पिछले चौबीस सालों में यह चौथी बढ़ोतरी है। कांग्रेस ने क्रीमी लेयर की सीमा बढ़ाए जाने की आलोचना की है, यह कहते हुए कि इससे पिछड़े वर्ग के गरीबों को नुकसान होगा। पर यह दलील विपक्ष में होने के नाते एक रस्म अदायगी से ज्यादा कुछ नहीं है। क्रीमी लेयर यानी ओबीसी आरक्षण की आय सीमा में पिछली बढ़ोतरी कांग्रेस या यूपीए सरकार ने ही की थी। अब फिर क्रीमी लेयर में बढ़ोतरी की गई है, तो यह अब तक चले आते सिलसिले के अनुरूप ही है। स्वाभाविक ही यह माना जाता है कि क्रीमी लेयर बढ़ने से आरक्षण पाने के हकदार अभ्यर्थियों का दायरा बढ़ जाता है। पर क्या वजह है कि केंद्र में ओबीसी आरक्षण लागू होने के सत्ताईस साल बाद भी केंद्र की नौकरियों में पिछड़ों की हिस्सेदारी केवल बारह फीसद है, इसकी पड़ताल होनी चाहिए।

बुधवार को ही सरकार ने घोषणा की कि ओबीसी कोटे के भीतर कोटा तय करने के लिए जल्दी एक आयोग गठित किया जाएगा, जो बारह महीनों में अपनी रिपोर्ट देगा। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने की पहल के बाद ओबीसी आरक्षण की बाबत यह एक और महत्त्वपूर्ण फैसला है, जिससे ओबीसी आरक्षण का स्वरूप तो प्रभावित होगा ही, राजनीति और अगले लोकसभा चुनाव पर भी इसका असर पड़ सकता है। यह शिकायत आम है कि आरक्षण का लाभ संबंधित आरक्षित वर्ग के तहत आने वाले सभी लोगों को समान रूप से नहीं मिल पा रहा है, अधिकांश लाभ उस वर्ग की अपेक्षया समर्थ जातियां ही पाती रही हैं। इसी शिकायत के मद्देनजर और समान अवसर के तकाजे से सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में ही उप-श्रेणी की व्यवस्था करने को कहा था। 2011 में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग और उसके कोई साल भर बाद एक संसदीय समिति ने भी इसी आशय की सिफारिश की थी। आयोग गठित करने की घोषणा कर सरकार ने उसी पर अमल करने का इरादा जताया है। फिलहाल यह साफ नहीं है कि उपश्रेणियां कितनी होंगी।

ओबीसी की अधिकतर जातियां चाहेंगी कि उन्हें अति पिछड़े की श्रेणी में रखा जाए, ताकि उन्हें बराबरी के या प्रबल प्रतिद्वंद्वियों का सामना न करना पड़े। इसलिए संभव है कि जिनमें आयोग के गठन की घोषणा से उम्मीद जगी होगी उनमें से भी कुछ लोगों को उसकी सिफारिशें नागवार गुजरें। आयोग किन आंकड़ों के आधार पर उप-श्रेणियां बनाएगा? जातिवार जनगणना के आंकड़े सरकार ने जारी नहीं किए हैं। क्या ये आंकड़े आयोग को मुहैया कराए जाएंगे? या कोई और अध्ययन आधार बनेगा? यह सवाल भी उठेगा कि उपश्रेणी अनुसूचित जाति के आरक्षण में क्यों नहीं, जबकि आरक्षण का लाभ सिकुड़े होने की शिकायत वहां भी है। ओबीसी आरक्षण की नई मागें जो मराठा, कापु, पटेल, जाट जैसे समुदाय कर रहे हैं वे तो आयोग के विचार के दायरे में भी नहीं हैं। लिहाजा, आरक्षण संबंधी विवाद खत्म हो जाएंगे, यह मान लेना नादानी होगी, बल्कि कुछ मायनों में नए विवाद उभर सकते हैं।

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