ताज़ा खबर
 

संपादकीयः संकट और उम्मीद

सर्वोच्च न्यायालय के दखल से फिलहाल इतना हुआ कि ग्राहकों से धोखाधड़ी करने वाले और अपने को दिवालिया बताने वाले बिल्डरों पर कानून का शिकंजा कसा। अदालत ने कई बिल्डरों से पैसा जमा करवाया और कुछ को जेल भी भिजवाया।

Author July 11, 2019 1:54 AM
अगर कोई बिल्डर कानूनी प्रक्रिया के तहत दिवालिया घोषित कर दिया जाता है तो सबसे पहले उसकी संपत्ति की बिक्री से बैंक अपना कर्ज वसूलेंगे।

लंबे समय से नोएडा-ग्रेटर नोएडा में बड़े बिल्डरों और फ्लैट खरीदारों के बीच चला आ रहा विवाद अभी तक किसी ऐसे ठोस समाधान तक नहीं पहुंच पाया है जिससे खरीदारों को जल्दी अपने घर का कब्जा मिलने का रास्ता साफ हो सके। मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है। बयालीस हजार से ज्यादा खरीदारों को संकट में देख सर्वोच्च अदालत ने इस मामले में अब तक काफी सख्त रुख दिखाया है। सर्वोच्च न्यायालय के दखल से फिलहाल इतना हुआ कि ग्राहकों से धोखाधड़ी करने वाले और अपने को दिवालिया बताने वाले बिल्डरों पर कानून का शिकंजा कसा। अदालत ने कई बिल्डरों से पैसा जमा करवाया और कुछ को जेल भी भिजवाया। लेकिन सर्वोच्च अदालत की इतनी सक्रियता और कड़ी कार्रवाई के बावजूद खरीदार खाली हाथ ही हैं। खरीदार लंबे समय से आंदोलन कर रहे हैं। इनमें ज्यादातर लोग ऐसे हैं जो पूरा पैसा दे चुके हैं और बैंक कर्ज की किस्त भी भर रहे हैं। साथ ही जिस घर में रह रहे हैं उसका किराया भी दे रहे हैं। इसके अलावा बिल्डर से मुकदमा लड़ने का खर्च अलग उठा रहे हैं। खरीदारों पर यह तिहरी मार है।

अब सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार से कहा है कि वही कोई उपाय करे जिससे खरीदारों को जल्द ही फ्लैटों का कब्जा दिलवाया जा सके। इसके लिए अदालत ने सरकार से ठोस व्यावहारिक प्रस्ताव बना कर देने को कहा है। अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है। देखने की बात यह है कि सरकार क्या कदम उठाती है। साफ है कि अगर सरकारें इतनी सजग और जनता के हितों की संरक्षक होतीं तो बिल्डर खरीदारों के साथ धोखाधड़ी करने का दुस्साहस नहीं कर पाते। बिल्डरों ने सरकारी नियम-कानूनों को ताक पर रखते हुए पिछले कुछ सालों में जिस तरह से कारोबार किया है वह एक भ्रष्ट तंत्र की पोल खोलता है। अब तक का घटनाक्रम बताता है कि बिल्डरों ने जम कर मनमर्जी की और सरकार की ओर से उन पर कोई निगरानी नहीं रखी गई। सरकार-बिल्डर गठजोड़ एक तरह से माफिया की तरह ही काम कर रहा है। अगर फ्लैट खरीदारों ने अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया होता और उनके हित में सुप्रीम कोर्ट ने कड़े कदम नहीं उठाए होते तो ऐसे बिल्डर कब के भाग निकले होते।

अब समस्या यह है कि अगर कोई बिल्डर कानूनी प्रक्रिया के तहत दिवालिया घोषित कर दिया जाता है तो सबसे पहले उसकी संपत्ति की बिक्री से बैंक अपना कर्ज वसूलेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल जेपी इन्फ्राटेक के खिलाफ दिवालिया कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया था। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि फ्लैट खरीदारों को पैसा या कब्जा कैसे मिलेगा? अदालत का रुख साफ है कि धोखेबाज बिल्डरों के खिलाफ कार्रवाई भी होगी और लोगों को उनके घर भी दिलवाए जाएंगे। पर यह संभव होगा कैसे, इसी का समाधान केंद्र को निकालना है। सुप्रीम कोर्ट ने दो महीने पहले आम्रपाली समूह की सभी पंद्रह आवासीय संपत्तियां दोनों प्राधिकरणों को सौंपने की बात कही थी, ताकि अधूरे काम पूरे हो सकें और लोगों को घर मिल सकें। लेकिन अधूरी परियोजनाओं को पूरा कराने के मामले में नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने हाथ खड़े कर दिए। बिल्डर दिवालिया हो रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट के कहने बाद भी सरकारी प्राधिकरण इस काम को कर पाने में लाचारी दिखा चुके हैं। तब कौन परियोजनाएं पूरी करेगा और लोगों को मकान देगा! ऐसे में खरीदारों के हितों की रक्षा के लिए केंद्र सरकार क्या प्रस्ताव तैयार करती है, सबकी उम्मीदें इसी पर टिकी हैं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App