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संपादकीयः नकदी पर नकेल

नोटबंदी के बाद स्थिति कुछ सामान्य होने लगी, तो अब बैंकों ने नकदी निकासी पर लगाम कसने का उपाय निकाला है।

Author Updated: March 4, 2017 3:14 AM
नोटबंदी के बाद स्थिति कुछ सामान्य होने लगी, तो अब बैंकों ने नकदी निकासी पर लगाम कसने का उपाय निकाला है। म

नोटबंदी के बाद स्थिति कुछ सामान्य होने लगी, तो अब बैंकों ने नकदी निकासी पर लगाम कसने का उपाय निकाला है। महीने में चार बार से अधिक नकदी लेन-देन पर बैंकों ने अपने-अपने ढंग से शुल्क वसूलना शुरू कर दिया है। माना जा रहा है कि इससे लोगों को नकदी रहित लेन-देन के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। बैंकों के इस फैसले का स्वाभाविक ही अखिल भारतीय व्यापारी संघ ने विरोध किया है। उनकी मांग है कि अगर सरकार बैंकों से नकदी निकालने पर नियंत्रण रखना चाहती है, तो उसे डिजिटल भुगतान पर लगने वाले शुल्क को समाप्त करना चाहिए। नोटबंदी के समय सरकार ने डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दिया था। इसके लिए इनामी योजनाएं भी चलाई गर्इं। तमाम बैंकों और ऐप आधारित वित्तीय कंपनियों ने डिजिटल भुगतान की प्रक्रिया को आसान बनाने का प्रयास किया। नोटबंदी के दौरान जब बैंकों में नकदी की किल्लत थी, सरकार ने डिजिटल भुगतान को शुल्क मुक्त रखने का आदेश दिया था। पर बैंकों और कंपनियों ने फिर से वही प्रक्रिया शुरू कर दी। ऐसे में, जब लोगों को बैंकों से पैसे निकालने और नकदी-रहित भुगतान दोनों के लिए शुल्क देना पड़ रहा है, तो उनका रोष समझा जा सकता है।

डिजिटल लेन-देन को प्रोत्साहित करने के पीछे सरकार की मंशा है कि इससे काले धन पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी। नकदी का प्रवाह जितना कम होगा, काले धन की संभावना उतनी ही क्षीण होती जाएगी। मगर हकीकत यह है कि डिजिटल लेन-देन आम लोगों के लिए खासा पेचीदा काम है। रोजमर्रा की जरूरतों के लिए लोगों को नकदी पर निर्भर रहना ही पड़ता है। फिर व्यापारियों और छोटे कारोबारियों के लिए संभव नहीं है कि वे डिजिटल भुगतान पर निर्भर रह सकें। कारोबारियों को वैसे भी महीने में कई बार पैसे निकालने और जमा कराने की जरूरत पड़ती है, इसलिए नकदी निकासी की सीमा तय कर देने और उससे अधिक निकासी पर मनमाना शुल्क वसूले जाने से उन्हें अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ रहा है। उधर डिजिटल भुगतान करने पर बैंक सेवा कर के रूप में अतिरिक्त रकम वसूलते हैं। नकदी-रहित लेन-देन को बढ़ावा देने के नाम पर बैंकों को दोहरी कमाई का मौका देना किसी रूप में उचित नहीं ठहराया जा सकता।

नोटबंदी के समय यह भी सवाल उठा था कि अगर किसी व्यक्ति ने आय कर चुकाने के बाद कोई रकम जमा की है, तो उसे पूरा अधिकार होना चाहिए कि उसे वह किस रूप में खर्च करे। उसे खर्च करने का तरीका बताने की कोशिश सरकार को क्यों करनी चाहिए या फिर बैंकों को उसके खर्च करने के तरीके को नियंत्रित करने का अधिकार क्यों होना चाहिए? अपना ही जमा पैसा अगर कोई व्यक्ति निकालना चाहता है तो उसे बगैर किसी ठोस तर्क के ऐसा करने से क्यों रोका जाना चाहिए? यह ठीक है कि बैंकों का कारोबार अपने ग्राहकों के जमा पैसे से ही चलता है, इसलिए हर खाते में न्यूनतम रकम रखने की शर्त रखी जाती है। फिर बैंक जो सेवाएं उपलब्ध कराते हैं, उनके बदले भी उन्हें शुल्क मिलना चाहिए, मगर ग्राहकों के लिए अपना पैसा निकालने की सीमा तय करके डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने की कोशिश उन पर ज्यादती ही कही जाएगी। तमाम अध्ययनों से जाहिर हो चुका है कि भारत जैसे देश में, जहां अधिसंख्य लोग तकनीकी संसाधनों के संचालन से अनभिज्ञ हैं, डिजिटल लेन-देन को अनिवार्य बनाना उचित नहीं है।

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