Opinion on britain election 2017 - Jansatta
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संपादकीयः ब्रिटेन का चुनाव

सात हफ्ते पहले ही ब्रिटेन की निवर्तमान प्रधानमंत्री टेरीजा मे ने अचानक इस उम्मीद में चुनाव की घोषणा कर दी थी कि इससे उन्हें फायदा होगा और वे भारी बहुमत के साथ सत्ता में लौटेंगी।

Author June 10, 2017 2:42 AM
सात हफ्ते पहले ही ब्रिटेन की निवर्तमान प्रधानमंत्री टेरीजा मे ने अचानक इस उम्मीद में चुनाव की घोषणा कर दी थी कि इससे उन्हें फायदा होगा और वे भारी बहुमत के साथ सत्ता में लौटेंगी।

सात हफ्ते पहले ही ब्रिटेन की निवर्तमान प्रधानमंत्री टेरीजा मे ने अचानक इस उम्मीद में चुनाव की घोषणा कर दी थी कि इससे उन्हें फायदा होगा और वे भारी बहुमत के साथ सत्ता में लौटेंगी। चुनावी सर्वेक्षणों में भी उनकी जीत के आसार जताए जा रहे थे। इसलिए जो नतीजा आया उसे किसी हद तक स्वाभाविक ही अप्रत्याशित कहा जा रहा है। यही नहीं, बहुतों के लिए यह हतप्रभ करने वाला भी है, क्योंकि लंबे अरसे बाद ऐसा हुआ जब ब्रिटेन के संसदीय चुनाव में किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। त्रिशंकु संसद की तस्वीर ऐसे समय उभरी है जब नई सरकार को ब्रेक्जिट की प्रक्रिया, शर्तों और कायदों पर यूरोपीय संघ से वार्ता करनी है, और प्रस्तावित बातचीत शुरू होने में बस दस दिन रह गए हैं। क्या प्रस्तावित वार्ता निर्धारित समय पर शुरू हो सकेगी, या इसमें विलंब हो सकता है? जो हो, ब्रेक्जिट संबंधी बातचीत के मद्देनजर ब्रिटेन को एक ऐसी सरकार की जरूरत थी जिसके पास स्पष्ट जनादेश हो और साफ बहुमत का बल हो। लेकिन ब्रेक्जिट के जनमत संग्रह के बाद यह दूसरा मौका है जब ब्रिटेन के मतदाताओं ने राजनीतिक पंडितों समेत सारी दुनिया को चौंकाया है। नए चुनाव के बाद ब्रिटेन की साढ़े छह सौ सदस्यों वाली संसद में टेरीजा मे की कंजरवेटिव पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में आई है, पर बहुमत से थोड़ा दूर है। जाहिर है, नंबर एक पर होने के बावजूद उसे नुकसान उठाना पड़ा है। पर सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है स्काटिश नेशनलिस्ट पार्टी को, जो कई बार अलगाववादी राग अलापने लगती है।

दूसरी तरफ लेबर पार्टी, डेमोक्रेटिक यूनियनिस्ट पार्टी और लिबरल डेमोक्रैट्स की सीटों में इजाफा हुआ है, पर सबसे ज्यादा फायदा हुआ है मुख्य विपक्षी दल लेबर पार्टी को। गठजोड़ के लिए उसके पास संभावित सहयोगी भी ज्यादा हैं, पर लेबर नेता जेरेमी कार्बिन के बजाय टेरीजा मे के नेतृत्व में सरकार बनने की संभावना अधिक है, क्योंकि उनकी पार्टी बहुमत से बस जरा-सा दूर है। सारे अनुमानों के विपरीत, कंजरवेटिव पार्टी को नुकसान क्यों उठाना पड़ा? दो कारण हो सकते हैं। एक यह कि चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में दो आतंकी हमले हुए जिनमें कुल तीस लोग मारे गए।

इससे मे की लोकप्रियता को झटका लगा, क्योंकि इससे पहले छह साल तक वे आंतरिक सुरक्षा मंत्री रह चुकी थीं और तब उन्होंने पुलिस अफसरों के पदों में कटौती कर दी थी। दूसरे, उनका चुनाव अभियान फीका रहा। दूसरी तरफ लेबर नेता जेरेमी कार्बिन ने निशुल्क उच्चशिक्षा समेत जीवन-स्तर में सुधार के अनेक वायदे किए और खासकर युवा मतदाताओं के बीच लेबर पार्टी को प्रबल समर्थन मिला। सबसे बुरा हश्र हुआ यूकेआइपी का। फासीवादी, नस्लवादी और आप्रवासी विरोधी नारे लगाने वाली इस पार्टी का सफाया हो गया। बहरहाल, नए चुनाव के बाद ब्रिटेन के सामने प्रश्न सिर्फ यह नहीं है कि शासन कौन चलाएगा बल्कि यह भी है कि ब्रेक्जिट के बाद की चुनौतियों से वह कैसे निपटेगा।

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