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संपादकीयः कानूनी आधार

आधार यानी विशिष्ट पहचान पत्र योजना को कानूनी आधार मिल गया है। संबंधित विधेयक को संसद की मंजूरी मिलने के बाद अब इस पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और अधिसूचना जारी होने की औपचारिकता ही बाकी है।

Author March 18, 2016 3:30 AM
(Photo-adharcardstatusonline.com)

आधार यानी विशिष्ट पहचान पत्र योजना को कानूनी आधार मिल गया है। संबंधित विधेयक को संसद की मंजूरी मिलने के बाद अब इस पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और अधिसूचना जारी होने की औपचारिकता ही बाकी है। देश में करीब सौ करोड़ लोगों के आधार कार्ड बन चुके हैं और यह प्रक्रिया अभी जारी है। यूपीए सरकार के समय जो पहल हुई थी, वह अब लगभग मंजिल पर पहुंच गई है। यह दिलचस्प है कि विपक्ष में रहते हुए भारतीय जनता पार्टी इस योजना की आलोचक थी।

तब यशवंत सिन्हा की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने इस योजना पर ढेरों सवाल उठाए थे। भाजपा ने यह तक कहा था कि अगर उसे सत्ता में आने का मौका मिला, तो आधार योजना को रद््द कर देगी। पर सत्ता में आने पर उसे इस योजना की खूबियां नजर आने लगीं। उसने न केवल आधार योजना को अंजाम दिया, बल्कि इसके लिए संसदीय परिपाटी से समझौता करने में भी उसे हिचक नहीं हुई।

आधार विधेयक को सरकार ने धन विधेयक के रूप में पेश किया। इसके पीछे दलील यह दी गई कि सबसिडी को आधार नंबरों से जोड़ा जाएगा, और इस तरह इसका वास्ता सरकार की ओर से होने वाले खर्च से है, लिहाजा इसे धन विधेयक मानने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए। पर विपक्ष ने कड़ा एतराज जताया। दरअसल, विपक्ष के विरोध से निपटने या विधेयक को जस का तस पास कराने के इरादे से ही आधार विधेयक को धन विधेयक के रूप में सरकार ने पेश किया। यह सही है कि सबसिडी सरकार की तरफ से होने वाला खर्च है, पर केवल यही बात धन विधेयक के लिए काफी नहीं है। न तो इसका संबंध राजस्व से है न उधारी आदि से।
चूंकि राज्यसभा में सत्तापक्ष का बहुमत नहीं है, इसलिए सरकार को यह डर रहा होगा कि कहीं विधेयक लटक न जाए, या स्थायी समिति को भेजने पर और विलंब न हो।

धन विधेयक पर राज्यसभा चर्चा तो कर सकती है, पर उसकी मंजूरी अनिवार्य नहीं है। विधेयक को लोकसभा पिछले हफ्ते ही पारित कर चुकी थी। राज्यसभा ने उसमें पांच संशोधन सुझाए। संशोधनों के मद््देनजर सरकार ने विधेयक को फिर से लोकसभा के पटल पर रखा, और लोकसभा ने सारे संशोधन खारिज कर दिए। इस तरह लोकसभा में अपने बहुमत के बल पर सरकार की मुराद पूरी हो गई। इसमें दो राय नहीं कि विधेयक का मकसद नेक है। रसोई गैस, फर्टिलाइजर आदि मदों में दी जाने वाली सबसिडी के वितरण में पारदर्शिता आए तथा उसका दुरुपयोग रोका जा सके, तो इससे आधार योजना की सार्थकता ही सिद्ध होगी। फिर सरकार छात्रवृत्ति, पेंशन आदि को भी आधार से जोड़ सकती है।

पर जिस तरह से विधेयक को संसदीय मंजूरी मिली है उससे कई अंदेशे भी पैदा हुए हैं। क्या आधार विधेयक शुरुआत है और सरकार आगे भी ऐसे कई विधेयकों को धन विधेयक के रूप में पेश कर सकती है जो संसदीय परिपाटी के हिसाब से धन विधेयक की परिभाषा या दायरे में नहीं आते? क्या यह राज्यसभा का महत्त्व घटाने तथा प्रकारांतर से विपक्ष को कमजोर करने की भी कवायद थी? एक अंदेशा शुरू से उठता रहा है, वह है निजता में अतिक्रमण का। अंगुली के निशान और आंख की पुतली की स्कैनिंग वाले आंकड़े इकट्ठा किए जाने से यह सवाल उठता रहा है कि कहीं इन आंकड़ों का बेजा इस्तेमाल तो नहीं होगा? वित्तमंत्री ने भरोसा दिलाया है कि दुरुपयोग नहीं होगा। पर क्या यह आश्वासन पर्याप्त है?

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