ताज़ा खबर
 

संपादकीयः संकल्प और सवाल

‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की पचहत्तरवीं वर्षगांठ के मौके पर संसद में नव भारत निर्माण का जो संकल्प लिया गया है, वह स्वागत-योग्य है।
Author August 11, 2017 02:54 am
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)

‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की पचहत्तरवीं वर्षगांठ के मौके पर संसद में नव भारत निर्माण का जो संकल्प लिया गया है, वह स्वागत-योग्य है। बिना संकल्प के कोई भी देश या समाज आगे नहीं बढ़ सकता। लेकिन ‘प्रथमग्रासे मक्षिकापात’ जैसी स्थिति तब उत्पन्न हुई जब प्रधानमंत्री, कांग्रेस अध्यक्ष और दूसरे दलों के सांसदों ने इस अवसर पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को भी ‘तेरे-मेरे’ में बांट दिया। इससे एक ऐतिहासिक और सुनहरा क्षण जैसे रंग में भंग वाले मुहावरे में तब्दील हो गया। गौरतलब है कि बुधवार को लोकसभा में विशेष चर्चा का आयोजन किया गया था। चर्चा के बाद सदन में लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने संकल्प पत्र पढ़ा, जिसे स्वीकार कर लिया गया। उन्होंने कहा कि देशवासियों को साथ लेकर 2022 तक महात्मा गांधी और सभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के सपनों के भारत का निर्माण करने के लिए, राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों के निर्वहन के लिए सदन कृतसंकल्पित है। संकल्प पत्र में कहा गया कि आज 9 अगस्त 2017 को भारत छोड़ो आंदोलन के पचहत्तरवें साल में सशक्त, भ्रष्टाचार-मुक्त, राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत आदि मूल्यों के प्रति समर्पित राष्ट्र-निर्माण का संकल्प लिया जा रहा है।

लोकसभा अध्यक्ष ने इस दौरान महात्मा गांधी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और वीर सावरकर का उल्लेख तो किया, लेकिन ग्यारह साल तक जेलों में रहने वाले और आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने वाले प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का कोई जिक्र तक नहीं किया। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि 1942 में ‘करो या मरो’ का नारा दिया गया था, उसी तरह से हम आज एक और संकल्प लेते हैं कि ‘करेंगे और करके रहेंगे।’ उन्होंने कहा कि 2022 तक हमें देश को भ्रष्टाचार, गरीबी और अशिक्षा से मुक्त कर देना है। प्रधानमंत्री ने इस मौके पर महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक, सुभाषचंद्र बोस, लाल बहादुर शास्त्री, जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह समेत तमाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के योगदान का स्मरण किया। मगर नेहरू का जिक्र उन्होंने भी नहीं किया। इसके बरक्स कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने भाषण के दौरान नेहरूजी का खुलकर जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जिस ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की चर्चा आज हो रही है, उसका प्रस्ताव मुंबई के कांग्रेस अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू ने ही रखा था, जिसे सरदार वल्लभ भाई पटेल ने समर्थन दिया था। उन्होंने इस मौके पर यह कटाक्ष भी किया कि हमें उन संगठनों और लोगों को नहीं भूलना चाहिए, जिन्होंने आजादी दिलाने में कोई भी योगदान नहीं दिया था। कांग्रेस अध्यक्ष ने यह भी कहा कि आज देश के धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी मूल्यों के लिए खतरा पैदा हो गया है। ‘अंधकार की ताकतें’ सिर उठा रही हैं और लोकतंत्र को खत्म करने के प्रयास हो रहे हैं।

दोनों सदनों में यह मौका बेशकीमती था और बेहतर यही था कि सिर्फ अपने दलों या संगठनों के ऐतिहासिक योगदानों की चर्चा तक सीमित न रह कर मुक्तमन, मुक्तहृदय और मुक्तकंठ से आजादी के शहीदों-बलिदानियों और सेनानियों के योगदानों को याद किया जाता। ऐसे अवसर को अपनी राजनीतिक हदबंदियों में बांधना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। क्योंकि, इतिहास को नहीं मिटाया जा सकता। उससे सबक लिए जा सकते हैं, प्रेरणा ली जा सकती है। अगस्त क्रांति के सेनानियों ने जिस तरह के भारत का सपना देखा था, क्या हम उसी दिशा में चल रहे हैं, या उलटी दिशा में जा रहे हैं?

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.