Opinion about Woman, 5-Year-Old Son Slip And Drown In River While Taking Selfie - Jansatta
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संपादकीयः मौत की सेल्फी

हाल के वर्षों में मोबाइल कैमरे के जरिए सेल्फी यानी अपनी तस्वीर खुद उतारने के शौक के जानलेवा साबित होने की खबरें जब-तब आती रही हैं।

Author January 19, 2018 2:26 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

हाल के वर्षों में मोबाइल कैमरे के जरिए सेल्फी यानी अपनी तस्वीर खुद उतारने के शौक के जानलेवा साबित होने की खबरें जब-तब आती रही हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि लोग ऐसी घटनाओं से कोई सबक नहीं लेते। ओड़िशा के रायगढ़ जिले में मंगलवार को सेल्फी लेने के क्रम में एक महिला और उसके बेटे की मौत हो गई। दरअसल, महिला अपने परिवार के साथ नागावली नदी के पुल पर घूमने गई थी। वहीं अपनी बेटी और बेटे के साथ कुछ तस्वीरें लेने के क्रम में तीनों फिसल कर नदी में गिर गए। स्थानीय लोगों ने किसी तरह बेटी को तो बचा लिया, लेकिन महिला और उसका बेटा डूब गए। किसी हादसे में हुई मौतों में हालात के कई पहलू होते हैं। लेकिन सेल्फी की वजह से हुई मौतें इसलिए ज्यादा दुखद हैं कि ये महज शौक के चलते बरती गई लापरवाही का नतीजा होती हैं।

रोजाना की एकरस जिंदगी में मनोरंजन या नएपन को मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी माना जाता है। लेकिन अगर इस तरह की गतिविधियां जानलेवा शौक में तब्दील हो जाएं तो उस शौक से तौबा कर लेना ही ठीक है। हाल में हुए कई अध्ययनों में सेल्फी लेने की आदत को एक मानसिक बीमारी बताया गया है, जिसका शिकार व्यक्ति इस बात का खयाल भी नहीं रख पाता कि खतरनाक जगहों पर अलग-अलग मुद्राओं में अपनी तस्वीरें उतारने के क्रम में उसकी जान भी जा सकती है। हालांकि अब कई लोगों को अपने भीतर ‘आॅब्सेसिव कंपलसिव डिसआॅर्डर’ नामक यह बीमारी होने का अहसास हो रहा है और वे इसका इलाज कराने अस्पतालों में पहुंच रहे हैं। मनोचिकित्सकों के मुताबिक ‘सेल्फीसाइटिस’ एक ऐसी स्थिति होती है, जिसमें व्यक्ति सेल्फी लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट नहीं करता है तो उसे बेचैनी होने लगती है। इसका अगला सिरा इससे जुड़ता है कि इस आदत के शिकार लोग सार्वजनिक रूप से तो सामाजिक दिखते हैं, खूब तस्वीरें साझा करते हैं, लेकिन उनके भीतर आत्मविश्वास का कोना धीरे-धीरे खाली होता जाता है।

करीब सवा साल पहले ‘मी, माइसेल्फ एंड माय किल्फी: कैरेक्टराइजिंग ऐंड प्रीवेंटिंग सेल्फी डेथ्स’ नाम से हुए एक अध्ययन के मुताबिक दुनिया भर में सेल्फी लेने के क्रम में हुई मौतों में से साठ फीसद अकेले भारत में हुई थीं। विडंबना यह है कि जो आदत इस कदर एक समस्या बन चुकी है उसका कोई हल तो सामने नहीं आ रहा है, लेकिन बाजार इसे भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। आज स्मार्टफोन में तब्दील हो चुके ज्यादातर मोबाइलों की बिक्री बढ़ाने के लिए कंपनियां विज्ञापन में ‘सेल्फी के लिहाज से बेहतरीन कैमरा’ होने को अपने उत्पाद की सबसे बड़ी खासियत बताती हैं। जाने-माने सितारे ऐसे मोबाइलों का प्रचार करते हुए उनके सेल्फी वाले पहलू को ज्यादा उभारते हैं। मुश्किल यह है कि सेल्फी मोबाइलों के विज्ञापन के समांतर किसी ऐसी सूचना का प्रसार नहीं दिखता, जो लोगों को इस शौक के जानलेवा जोखिम के बारे में सचेत करे।

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