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संपादकीयः बेलगाम अपराधी

उत्तर प्रदेश में आपराधिक घटनाओंं का सिलसिला जिस तरह कायम है, उससे यही सवाल उठता है कि क्या राज्य का प्रशासन पंगु हो गया है या फिर कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर वह बेहद कमजोर साबित हो रहा है!

Author Updated: April 5, 2019 1:52 AM
प्रतीकात्मक फोटो (फोटो सोर्स : इंडियन एक्सप्रेस)

उत्तर प्रदेश में आपराधिक घटनाओंं का सिलसिला जिस तरह कायम है, उससे यही सवाल उठता है कि क्या राज्य का प्रशासन पंगु हो गया है या फिर कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर वह बेहद कमजोर साबित हो रहा है! विडंबना है कि आपराधिक वाकयों का दायरा अब किसी सुनसान या अन्य इलाकों तक नहीं सिमटा हुआ है, बल्कि यह विश्वविद्यालय परिसरों में भी फैल रहा है। मंगलवार को बीएचयू यानी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में एमसीए के एक छात्र की जिस तरह हत्या की गई, वह अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस का क्या कर्तव्य है और वे उसके प्रति कितने चौकस हैं। गौरतलब है कि बीएचयू परिसर में बिड़ला छात्रावास के चौराहे के पास एक छात्र को मोटरसाइकिल पर सवार कुछ लोगों ने गोली मार दी और आराम से चलते बने। इस घटना से गुस्साए विद्यार्थियों के हंगामे के बाद पुलिस ने आरोपियों को हिरासत में ले लिया है। पर सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि बीएचयू परिसर में इस कदर बेखौफ होकर अपराधियों को गोलीबारी करने की हिम्मत कहां से मिली।

दरअसल, पिछले कुछ समय से राज्य में जिस तरह की आपराधिक घटनाएं सामने आ रही हैं और उनमें कानूनी कार्रवाई करने को लेकर सरकार और प्रशासन का जो ढीला-ढाला रुख रहा है, उससे अपराधियों का मनोबल बढ़ा है। यही वजह है कि आज विश्वविद्यालय परिसरों में भी सरेआम हत्या की घटनाएं सामने आ रही हैं। हालांकि यह कोई अकेली घटना नहीं है, जिससे राज्य के प्रशासन की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगे हैं। पिछले कुछ समय से उत्तर प्रदेश में ऐसी घटनाओं की बाढ़-सी आ गई है। क्या यही वजह नहीं है कि लोगों ने अब राज्य सरकार की क्षमता पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। गुरुवार को एक महिला पुलिसकर्मी पर कुछ युवकों ने तेजाब से हमला कर दिया। सवाल है कि आखिर वे कौन-सी स्थितियां हैं, जिनके चलते राज्य में आपराधिक मानसिकता वाले लोगों का हौसला बढ़ता जा रहा है।

कहने को उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने यह जताने में कोई कमी नहीं की है कि समूचे राज्य में अपराध के खिलाफ हल्ला बोल दिया गया है और बड़ी तादाद में आपराधिक तत्त्वों पर शिकंजा कसा गया है। खासतौर पर राज्य सरकार पिछले कुछ समय के दौरान मुठभेड़ में मार गिराए अपराधियों का हवाला देकर यह दर्शाती रही है कि वह इस मसले पर काफी सख्त है। मगर जहां मुठभेड़ में मारे गए लोगों के मामले में राज्य सरकार के रुख पर तीखे सवाल उभरे हैं, वहीं उनका असर भी बाकी आपराधिक घटनाओं पर शायद ही देखने में आ रहा है। जघन्य आपराधिक वारदात का सिलसिला आज भी राज्य में कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर मौजूद व्यापक लापरवाही का ही सबूत है।

यही वजह है कि आज उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार कठघरे में खड़ी है और उससे पूछा जा रहा है कि सत्ता में आने से पहले उसने इस मसले पर जो वादे किए थे, उनका क्या हुआ। गौरतलब है कि राज्य में पिछली सरकार के कामकाज और सबसे ज्यादा कानून-व्यवस्था पर सवाल उठा कर ही भाजपा ने राज्य की जनता का समर्थन हासिल किया था। आज महज कुछ सालों के भीतर हालत यह हो चुकी है कि अपराधों के मामले में उत्तर प्रदेश को सबसे ज्यादा गंभीर स्थिति में पहुंच चुके राज्यों में से एक माना जाने लगा है।

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