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संपादकीयः फजीहत के बाद

इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि कानून के राज का दावा करने वाली सरकार को उसकी जिम्मेदारी की याद दिलाने के लिए अदालत को आदेश देना पड़ता है।

Author April 14, 2018 01:45 am
गिरफ्तार हुए आरोपी बीजेपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर। (एक्सप्रेस फोटोः विशाल श्रीवास्तव)

इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि कानून के राज का दावा करने वाली सरकार को उसकी जिम्मेदारी की याद दिलाने के लिए अदालत को आदेश देना पड़ता है। उत्तर प्रदेश के उन्नाव में सामूहिक बलात्कार के आरोप के बाद राज्य सरकार और वहां की पुलिस ने कार्रवाई में जिस तरह की लापरवाही बरती, उससे यही संदेश गया कि अभियुक्त को बचाने की कोशिश की जा रही है। जबकि इस मामले में जिस तरह के घटनाक्रम सामने आ रहे थे, उसमें कानूनी कदम उठाने के मजबूत आधार थे। लेकिन आरोपी चूंकि रसूखदार पृष्ठभूमि से हैं, शायद इसीलिए उनके खिलाफ कार्रवाई में अब तक टालमटोल हो रही थी। हालांकि राज्य सरकार के पास पूरा मौका था कि वह इस प्रकरण में समय रहते ठोस कदम उठाए। मगर विवाद ने जब तूल पकड़ लिया और मुख्य आरोपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की गिरफ्तारी के लिए दबाव बढ़ने लगा तब भी पर्याप्त साक्ष्य न होने की दलील देकर उसे गिरफ्तार नहीं किया गया। हालात यहां तक पहुंचे कि आखिर हाईकोर्ट को यह सख्त आदेश जारी करना पड़ा कि आरोपी को हिरासत में रखना काफी नहीं है, उसे गिरफ्तार किया जाए। सवाल है कि सरकार के सामने कौन-सी मजबूरी थी कि वह सेंगर के खिलाफ कार्रवाई से बच रही थी!

गौरतलब है कि सामूहिक बलात्कार की पीड़ित लड़की ने अपनी शिकायत पर कार्रवाई न होने से हताश होकर मुख्यमंत्री आवास के सामने आत्मदाह की कोशिश की थी। उसके बावजूद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ कोई कार्रवाई करना जरूरी नहीं समझा। एक तरह से यह आरोपियों को शह देना था और शायद यही वजह है कि उन्होंने पीड़ित लड़की के पिता की बर्बरता से पिटाई की, जिसके चलते आखिर उसकी मौत हो गई। मरने से पहले के एक वीडियो में उसने साफ तौर पर विधायक के भाई का नाम लिया था। इसके अलावा, एक अन्य आॅडियो क्लिप के मुताबिक विधायक पर शक गहरा रहा था। यह समझना मुश्किल है कि पुलिस ने किस दबाव के तहत आरोपियों को एक तरह से खुली छूट दे रखी थी या उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने से बच रही थी। अगर समय पर पुलिस ने जरूरी कदम उठाए होते तो पीड़ित लड़की के पिता की जान बच सकती थी।

अब हालत यह है कि इस मामले पर लोगों के बीच उठे आक्रोश का दायरा देश भर में फैल चुका है और उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार पर आरोपियों को बचाने की कोशिश करने के आरोप लग रहे हैं। ऐसी स्थिति तब है जब सरकार आपराधिक घटनाओं और अपराधियों के खिलाफ बेहद सख्त होने के दावे कर रही है। मगर क्या सरकार अपराध में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने में अपनी सुविधा से कदम उठा रही है? अफसोस यह है कि विधानसभा चुनावों के पहले भाजपा ने उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था के बिगड़े हालात का ही हवाला दिया था और उसे दुरुस्त करने का भरोसा दिया था। उन्नाव सामूहिक बलात्कार के आरोप और फिर पीड़ित लड़की के पिता की बेरहमी से पिटाई से हुई मौत की घटना पर सरकार ने अगर पहले ही शिद्दत से कार्रवाई की होती तो निश्चित रूप से कानून का राज कायम करने के उसके दावे मजबूत होते। मगर इस मामले में अदालती आदेशों पर अमल के लिए बाध्य होना किसी सरकार की नीयत और कार्यशैली पर सवालिया निशान है। क्या यह सरकार के लिए एक असुविधाजनक स्थिति नहीं है?

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