ताज़ा खबर
 

संपादकीयः अंधविश्वास की जकड़न

सवाल है कि आखिर किन वजहों से मृतक के परिजनों के साथ-साथ वहां के स्थानीय निवासियों में से किसी को इस बेमानी धारणा पर सवाल उठाना और उसे महज अंधविश्वास बताना जरूरी नहीं लगा। खबरों के मुताबिक ग्रामीणों की भीड़ के दबाव में स्वास्थ्य केंद्र में मौजूद डॉक्टर भी लाचार थे और वे भी इस घटना को रोक नहीं सके।

Author Published on: August 22, 2019 2:18 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

इक्कीसवीं सदी के इस दौर में हम वैज्ञानिक उपलब्धियों के जरिए मंगल और चांद पर शोध की जो नई ऊंचाइयां हासिल कर रहे हैं, उसे दुनिया भर में एक बड़ी कामयाबी के तौर पर देखा जा रहा है। मगर इसी के समांतर जब अंधविश्वास में डूबी गतिविधियों की खबर मिलती है तो निश्चित रूप से यह बेहद अफसोस की बात है। मध्यप्रदेश के इंदौर जिले में दो मृत भाइयों के पुनर्जीवन की इच्छा से जिस तरह के अंधविश्वास का खुला प्रदर्शन देखा गया, उससे फिर यही साफ हुआ है कि अभी इस मोर्चे पर बहुत कुछ किया जाना बाकी है। गौरतलब है कि इंदौर जिला मुख्यालय से करीब तीस किलोमीटर दूर तालाब में डूब गए दो भाइयों को निकाल कर सांवेर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में लाया गया था। वहां डॉक्टरों ने जांच करने के बाद दोनों को मृत घोषित कर दिया और पोस्टमार्टम के बाद शवों को उनके परिजनों को सौंप दिया गया था। लेकिन परिजनों ने चूंकि सोशल मीडिया पर कहीं पढ़ा था कि मृतक के शरीर को अगर नमक से ढक कर रखा जाए तो वह फिर से जी उठता है, इसलिए उन्होंने डॉक्टरों की राय और पोस्टमार्टम की रिपोर्ट को किनारे कर दिया और शवों को नमक से ढक दिया।

सवाल है कि आखिर किन वजहों से मृतक के परिजनों के साथ-साथ वहां के स्थानीय निवासियों में से किसी को इस बेमानी धारणा पर सवाल उठाना और उसे महज अंधविश्वास बताना जरूरी नहीं लगा। खबरों के मुताबिक ग्रामीणों की भीड़ के दबाव में स्वास्थ्य केंद्र में मौजूद डॉक्टर भी लाचार थे और वे भी इस घटना को रोक नहीं सके। जैसा कि स्वाभाविक था, अफवाह पर आधारित एक बेमानी कवायद नाकाम हुई और आखिरकार मृत भाइयों के परिजनों और गांव वालों को सच्चाई को स्वीकार करना पड़ा कि किसी मर चुके व्यक्ति को अंधविश्वास के सहारे जिंदा नहीं किया जा सकता। इतना तय है कि वहां कुछ लोग पढ़े-लिखे जरूर होंगे। लेकिन उस पढ़ाई-लिखाई का क्या फायदा जो सामान्य से अंधविश्वास पर आधारित धारणाओं को तोड़ने में भी मददगार साबित नहीं हो सके। ऐसे लोगों के सोचने-समझने के स्तर और उसके लिए जिम्मेदार स्थितियों का अंदाजा लगाया जा सकता है, जिसमें कोई व्यक्ति किसी कल्पना या अंधविश्वास को इसलिए सही मान लेता है कि वह सोशल मीडिया पर कहीं लिखा हुआ था।

इस समूची घटना की विडंबना यह भी है कि जो सोशल मीडिया तकनीकी विकास और विज्ञान की उपलब्धियों का एक औजार माना जाता है, वही आज अंधविश्वास को फैलाने का जरिया भी बन रहा है। दरअसल, हमारे देश में विज्ञान विषयों की पढ़ाई तो कराई जाती है लेकिन शायद ही कहीं वैज्ञानिक चेतना के विकास और उसे मजबूत करने पर जोर दिया जाता है। यह बेवजह नहीं है कि कई बार बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धियों के मौके पर भी आस्था के नाम पर अंधविश्वास को बढ़ाने वाली गतिविधियां देखी जाती हैं। जबकि संविधान में मौजूद अनुच्छेद 51-ए (एच) के तहत मानवीयता, वैज्ञानिक चेतना और तार्किक सोच को बढ़ावा देने के लिए सरकार और समाज की जिम्मेदारी तय की गई है।

सवाल है कि संविधान में दर्ज व्यवस्था के बावजूद समाज में अंधविश्वास पर आधारित गतिविधियां और उसे फैलाने की कोशिशें कैसे बदस्तूर जारी रहती हैं! अंधविश्वास पर आधारित पिछड़ेपन और अफसोसनाक परंपराओं को बनाए रख कर क्या कोई भी समाज केवल साक्षरता दर में इजाफे के बूते और अक्सर बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धियों पर गर्व कर सकता है? जरूरत इस बात की है कि वक्त के साथ समाज में अंधविश्वासों को दूर करने के लिए इसके खिलाफ एक सख्त कानून बनाया जाए और वैज्ञानिक चेतना के विकास के साथ-साथ उसे मजबूत करने के लिए व्यापक अभियान चलाया जाए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 संपादकीय: लापरवाही की आग
2 संपादकीय: पाक को झटका
3 संपादकीय: बेखौफ अपराधी