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संपादकीयः पुनर्विचार का आधार

यह कभी-कभार ही हुआ है कि उच्चतम न्यायालय पूर्व में दिए अपने ही किसी फैसले से अलग रुख दिखाए। लिहाजा, भारतीय दंड संहिता की धारा 377 की बाबत सर्वोच्च न्यायालय का ताजा रुख एक विरल घटना है।
Author January 10, 2018 01:36 am
सर्वोच्च न्यायालय ने दिसंबर 2013 में धारा 377 को संवैधानिक ठहरा कर दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया।

यह कभी-कभार ही हुआ है कि उच्चतम न्यायालय पूर्व में दिए अपने ही किसी फैसले से अलग रुख दिखाए। लिहाजा, भारतीय दंड संहिता की धारा 377 की बाबत सर्वोच्च न्यायालय का ताजा रुख एक विरल घटना है। स्वागत-योग्य भी। यह धारा ‘अप्राकृतिक अपराधों’ का हवाला देते हुए ‘प्रकृति के विपरीत’ यौनाचार को अपराध मानती है और यह अपराध करने वाले व्यक्ति को संबंधित कानून के तहत उम्रकैद या एक तय अवधि की सजा हो सकती है, जो दस साल तक बढ़ाई जा सकती है; उस पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है। इस कानून की गिनती सबसे ज्यादा विवादास्पद कानूनों में होती रही है। इस कानून के औचित्य और इसकी संवैधानिकता पर काफी समय से सवाल उठाए जा रहे थे, पर इस दिशा में सफलता मिली 2009 में, जब दिल्ली उच्च न्यायालय ने धारा 377 को, जहां तक वह समलैंगिकता को अपराध ठहराती है, असंवैधानिक ठहरा दिया। यह व्यक्ति की अपनी पसंद और उसकी स्वायत्तता तथा निजता की रक्षा के लिहाज से एक ऐतिहासिक फैसला था। पर कुछ लोगों ने इसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर दी। सर्वोच्च न्यायालय ने दिसंबर 2013 में धारा 377 को संवैधानिक ठहरा कर दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया। पर अब सर्वोच्च अदालत को खुद अपने उस फैसले की खामियां दिखने लगी हैं।
उस फैसले पर पुनर्विचार की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय पीठ ने न सिर्फ बिना अगर-मगर किए याचिका स्वीकार कर ली, बल्कि इस मामले को संविधान पीठ को सौंपने का एलान भी कर दिया।

इस पर संविधान पीठ का फैसला जब भी आए, अदालत के बदले हुए रुख का कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है। याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि समाज का एक अंश या कुछ व्यक्ति अपने हिसाब से, अपनी पसंद से जीवन जीना चाहते हैं, तो उन्हें भय में क्यों रहना चाहिए? समाज के नैतिक मानदंड हमेशा वही नहीं रहते, जमाने के साथ बदलते भी हैं। पुनर्विचार का संवैधानिक आधार भी है। धारा 377 संविधान निर्माण के दौरान हुई बहसों की देन नहीं है, बल्कि इस कानून की शुरुआत औपनिवेशिक जमाने में हुई थी। इसके पीछे अंगरेजी हुकूमत की जो भी मंशा या सोच रही हो, इसे बनाए रखने का अब कोई औचित्य नहीं है। सच तो यह है कि इस कानून को बहुत पहले विदा हो जाना चाहिए था। हमारा संविधान कानून के समक्ष समानता और जीने के अधिकार की बात करता है। फिर, वह दो बालिगों के बीच सहमति से बनाए गए संबंध को अपराध नहीं मानता। ऐसे में, दो बालिगों के अलग तरह के यौन झुकाव को अपराध कैसे ठहराया जा सकता है?

किसी की निगाह में या बहुतों की राय में कोई संबंध अप्राकृतिक हो सकता है, पर उसे अपराध क्यों माना जाए? अपराध हमेशा अन्य को नुकसान पहुंचाने से परिभाषित होता है। सिर्फ इस आधार पर कि किसी का यौन झुकाव औरों से अलग है, उसे अपराधी कैसे माना जा सकता है? उसे अपराधी मानना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ भी होगा, और सभ्य समाज के विधि शास्त्र के खिलाफ भी। साथ ही, यह हमारे संविधान के अनुच्छेद चौदह, पंद्रह और इक्कीस के खिलाफ भी है। यही नहीं, निजता के मामले में आए सर्वोच्च अदालत के फैसले से भी धारा तीन सौ सतहत्तर कतई मेल नहीं खाती। पिछले साल अगस्त में नौ न्यायाधीशों के संविधान पीठ ने अपने ऐतिहासिक फैसले में निजता को एक मौलिक अधिकार ठहराया था। जबकि 377 को संवैधानिक मानने वाला 2013 का फैसला सर्वोच्च न्यायालय के सिर्फ दो जजों के पीठ का था। निजता संबंधी सर्वोच्च अदालत के फैसले के बाद तो धारा 377 पर पुनर्विचार और भी जरूरी हो गया है।

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