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संपादकीयः खाप के खिलाफ

खाप पंचायतों के मसले पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने जरूरी दखल दिया है। संविधान हर बालिग नागरिक को अधिकार देता है कि वह अपनी पसंद और सहमति से किसी से प्रेम और विवाह कर सकता है, लेकिन बड़ी विडंबना है कि सामाजिक परंपरा के नाम पर कोई पंचायत उसे ऐसा करने से रोकती है।
Author January 18, 2018 02:51 am
(खाप पंचायत)

खाप पंचायतों के मसले पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने जरूरी दखल दिया है। संविधान हर बालिग नागरिक को अधिकार देता है कि वह अपनी पसंद और सहमति से किसी से प्रेम और विवाह कर सकता है, लेकिन बड़ी विडंबना है कि सामाजिक परंपरा के नाम पर कोई पंचायत उसे ऐसा करने से रोकती है। यह देश की संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर ठीक ही कहा है कि अगर कोई बालिग लड़का और लड़की अपनी मर्जी से शादी करते हैं, तो यह उनका अधिकार है; इस पर कोई भी खाप पंचायत, सामाजिक समूह या व्यक्ति न तो सवाल उठा सकता है, न सजा तय कर सकता है। यानी देश की शीर्ष अदालत इस बारे में बिल्कुल स्पष्ट राय रखती है कि किसी नागरिक को उसके संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। पर विचित्र है कि सरकारों को भी इन नियमों पर अमल सुनिश्चित कराना प्राथमिक जिम्मेदारी नहीं लगती। आखिर वे कौन-सी वजहें हैं कि प्रेमी जोड़ों और अंतरजातीय विवाह से जुड़े मामले में कोई खाप पंचायत गैरकानूनी तरीके से सामंती फरमान जारी करती है, कई बार उन पर हिंसक हमला भी होता है, लेकिन उनके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं की जाती?

ऐसे मामले अक्सर सामने आते रहे हैं, जिनमें किसी प्रेमी जोड़े को सिर्फ इसलिए मार डालने का फरमान सुनाया गया या मार डाला गया कि वे या तो सगोत्रीय संबंध में थे या फिर अलग-अलग जातियों की पहचान से आते थे। यह स्थिति न केवल एक सभ्य समाज के लिहाज से अमानवीय, बल्कि संविधान और कानून के खिलाफ खुली चुनौती है। शीर्ष अदालत जिस मामले की सुनवाई कर रही है, वह 2010 से चल रहा है। पर केंद्र सरकार अपनी मर्जी से शादी करने वालों को सुरक्षा देने से संबंधित कोई ठोस कानून लाना तो दूर, अब तक कोई सुझाव भी पेश नहीं कर पाई है। जबकि विधि आयोग पहले ही अंतरजातीय विवाह करने वालों की सुरक्षा के लिए कानून बनाने की सिफारिश कर चुका है। इस रवैये पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर खाप पंचायतों पर पाबंदी लगाने में केंद्र सरकार नाकाम है और इस मसले पर कानून आने में देरी होती है तो अब अदालत को इसमें दखल देना पड़ेगा।
एक परिपक्व लोकतंत्र सामाजिक विकास के मकसद से तय संवैधानिक नियम-कायदों से चलता है।

अगर संविधान के तहत नागरिकों को कोई अधिकार हासिल है तो स्थानीय स्तर पर गठित कोई सामाजिक समूह या पंचायतें उसे बाधित नहीं कर सकतीं। यों भी, सामाजिक व्यवस्था को सुचारु तरीके से चलाने का दावा करने वाले किसी संगठन या संस्था की गतिविधियां एक प्रगतिशील और सभ्य समाज बनाने को लक्षित होनी चाहिए, न कि किसी जड़ परंपरा को बनाए रखने की खातिर अमानवीयता की हद तक जाने के लिए। विडंबना यह है कि समाज में जिस तरह के प्रेम संबंधों और विवाहों को जातिगत विद्वेष या इससे जुड़ी समस्याओं और जड़ता का सामना करने का सबसे कारगर उपाय माना जाता है, उनके खिलाफ खाप पंचायतें कई बार आपराधिक स्तर तक सक्रिय हो जाती हैं। मगर विकासमान समाज के लिए जरूरी शिक्षा, सेहत या रोजगार जैसे मुद्दों पर विचार करना उन्हें कभी जरूरी नहीं लगता। प्रेम और अंतरजातीय विवाह एक सभ्य और संवेदनशील समाज के निर्माण में सहायक साबित हो सकते हैं। इसलिए जरूरत है कि इसमें गैरकानूनी तरीके से दखल देने वाले समूहों पर लगाम लगाने की व्यवस्था हो।

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