ताज़ा खबर
 

संपादकीयः कानूनी तकाजा

यह उम्मीद की जाती है कि किसी विवाद की स्थिति में सुप्रीम कोर्ट का फैसला सभी पक्षों के लिए मान्य होगा और सरकार उस पर अमल के लिए बाध्य होगी।

Author January 25, 2018 2:43 AM
Padmaavat Movie फिल्म पद्मावत का एक दृश्य (दीपिका पादुकोण और शाहिद कपूर)

यह उम्मीद की जाती है कि किसी विवाद की स्थिति में सुप्रीम कोर्ट का फैसला सभी पक्षों के लिए मान्य होगा और सरकार उस पर अमल के लिए बाध्य होगी। पिछले हफ्ते अठारह जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले के जरिए ‘पद्मावत’ फिल्म के प्रदर्शन को लेकर रास्ता साफ कर दिया था। उसके मुताबिक भाजपा शासित उन प्रदेशों की सरकारों को भी फिल्म का प्रदर्शन सुनिश्चित करने को कहा गया था, जिन्होंने अपने राज्य में उसके प्रदर्शन पर पाबंदी की घोषणा कर दी थी। मगर उसके बाद भी मध्यप्रदेश और राजस्थान की सरकारों ने फिर से अदालत में दलील दी कि इस फिल्म के प्रदर्शन से राज्यों में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है। यानी क्या सरकारें यह कहना चाहती हैं कि राज्य का सुरक्षा तंत्र किसी जातीय समूह की ओर से हिंसा या उत्पात की धमकी का सामना कर सकने की क्षमता नहीं रखता है? अगर ऐसा नहीं है तो कम से कम सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हालात से निपटने के लिए राज्य सरकारों को जहां कानून-व्यवस्था बनाए रखने और आम नागरिकों की सुरक्षा की पूरी तैयारी करनी चाहिए थी, उन्होंने दोबारा अदालत से फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने की मांग क्यों की!

स्वाभाविक ही सुप्रीम कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि लोगों को निश्चित तौर पर यह समझना चाहिए कि उन्हें अठारह जनवरी के अदालत के फैसले का पालन करना ही होगा; हम अपने आदेश में संशोधन करने के इच्छुक नहीं हैं और कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्यों की जिम्मेदारी है। दरअसल, भावनाएं आहत होने के नाम पर ‘पद्मावत’ फिल्म के प्रदर्शन के खिलाफ करणी सेना नाम के एक जातीय संगठन ने हिंसक रुख अख्तियार किया हुआ है। हालत यह है कि सेंसर बोर्ड से प्रमाण पत्र मिलने और शीर्ष अदालत के फैसले के बावजूद कुछ लोग अब भी इस फिल्म को रोकने की जिद ठाने हुए हैं और धमकी भरे संदेश जारी किए जा रहे हैं। सवाल है कि इन लोगों की नजर में सुप्रीम कोर्ट की राय और कानून की कोई अहमियत है या नहीं! विडंबना यह है कि जब करणी सेना ‘पद्मावत’ के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन कर रही थी या इस मसले पर कानून को ताक पर रखने की धमकी जारी कर रही थी तो कुछ राज्यों की सरकारों ने उस पर काबू पाने के बजाय एक तरह से उसकी बात मान कर फिल्म पर रोक की घोषणा कर दी।

जाहिर है, सरकारों के इस तरह के रुख से अराजक तत्त्वों को शह मिली और वे अदालत के फैसले तक को महत्त्व देने के लिए तैयार नहीं हैं! सवाल है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले और कानून तक को धता बताने वाले ऐसे तत्त्वों को कैसे देखा जाएगा! भावनाएं आहत होने के नाम पर किसी अभिव्यक्ति को बाधित करने की सीमा आखिर क्या होगी? जो लोग या समूह आज किसी फिल्म के पात्र को ऐतिहासिक बता कर अपनी भावनाएं आहत होने के नाम पर हिंसक रुख अख्तियार किए हुए हैं, क्या वे दूसरे सामाजिक समूहों या समुदायों की ओर से उठने वाले सवालों को भी स्वीकार कर पाएंगे? यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि इस सिरे से उपजे विवाद देश के सामने गंभीर समस्या खड़ी कर सकते हैं। इसलिए जरूरत इस बात की है कि सरकारें सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ‘पद्मावत’ के सुरक्षित प्रदर्शन और कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए हर जरूरी कदम उठाएं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App