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संपादकीयः विरोध की राह

जाहिर है, अदालत ने फिलहाल बीच का रास्ता अपनाया है। यों भी न्याय एक प्रक्रिया के तहत ही सुनिश्चित होता है और सुप्रीम कोर्ट की यह राय स्वाभाविक है। इसमें दोनों पक्षों के लिहाज से जरूरी तकाजों के साथ-साथ अदालत ने देश के लोकतांत्रिक ढांचे का भी खयाल रखा है और यह स्वागतयोग्य है।

Author Published on: February 11, 2020 2:52 AM
सुप्रीम कोर्ट ( इंडियन एक्सप्रेस फोटो: प्रवीण खन्ना)

एक लोकतांत्रिक प्रणाली में किसी मसले पर असहमति जताने या विरोध प्रदर्शन करने का हक स्वाभाविक स्थिति है। लेकिन किन्हीं हालात में जब ऐसे प्रदर्शनों का क्रम लंबा खिंचता है तो कुछ हलकों से उससे होने वाली असुविधाओं पर सवाल उठने लगते हैं। नागरिकता संशोधन कानून लागू होने के बाद से ही देश के अलग-अलग हिस्सों में पिछले करीब दो महीने से विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं। इनमें राजधानी दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में चल रहे विरोध प्रदर्शन ने सबका ध्यान खींचा है। लेकिन चूंकि इस प्रदर्शन की वजह से वहां की सड़कें बाधित हैं और लोगों की सामान्य आवाजाही संभव नहीं हो पा रही है, इसलिए कुछ लोग प्रदर्शनकारियों से बातचीत के बाद रास्ता खोलने की अपेक्षा कर रहे हैं, तो यह मामला अदालत में भी पहुंच गया है।

इस मसले पर दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल कोई दखल देने से तो इनकार किया, लेकिन कुछ अहम राय जाहिर की है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि आप सार्वजनिक सड़कों को अवरुद्ध नहीं कर सकते; अगर आप विरोध करना चाहते हैं तो ऐसा एक निर्धारित स्थान पर होना चांहिए।

अदालत ने एक तरह से काफी दिनों से बाधित सड़क यातायात को लेकर चिंता जताई है, लेकिन इस पर फिलहाल कोई अंतरिम निर्देश जारी करने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि ऐसा एकपक्षीय नहीं हो सकता। हालांकि असुविधा का सवाल उठाने वाले याचिकाकर्ताओं के पक्ष पर विचार करने के साथ-साथ अदालत ने प्रदर्शनकारियों के विरोध के लोकतांत्रिक अधिकारों को भी यह कह कर सुरक्षित रखा कि एक कानून और इससे संबंधित मामला न्यायालय में लंबित होने के बावजूद लोग विरोध कर रहे हैं तो भी ऐसा करने का उन्हें हक है!

जाहिर है, अदालत ने फिलहाल बीच का रास्ता अपनाया है। यों भी न्याय एक प्रक्रिया के तहत ही सुनिश्चित होता है और सुप्रीम कोर्ट की यह राय स्वाभाविक है। इसमें दोनों पक्षों के लिहाज से जरूरी तकाजों के साथ-साथ अदालत ने देश के लोकतांत्रिक ढांचे का भी खयाल रखा है और यह स्वागतयोग्य है। लेकिन यह मुद्दा अब जिस तरह देशव्यापी महत्त्व का हो चुका है और राजनीतिक रूप से संवेदनशील भी है, इसलिए इस पर सभी का पक्ष सुने बिना कोई फैसला सुनाना उचित नहीं होता। इसलिए अदालत ने इस मसले पर सुनवाई की अगली तारीख सत्रह फरवरी तय की है।

गौरतलब है कि दिल्ली के शाहीन बाग में लोगों ने नागरिकता संशोधन कानून के अलावा राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर से जुड़ी आशंकाओं के मद्देनजर अपना विरोध प्रदर्शन बीते करीब दो महीने से जारी रखा हुआ है। चूंकि यह प्रदर्शन दिल्ली से नोएडा को जोड़ने वाली एक मुख्य सड़क पर ही चल रहा है, इसलिए वहां से वाहनों की आवाजाही लगभग पूरी तरह बाधित है। केवल स्कूल बस और एंबुलेंसों के लिए रास्ता खुलता है। लेकिन इस सड़क से रोजाना लाखों लोगों का दिल्ली और नोएडा के बीच आना-जाना होता रहा है और सड़क बंद होने की वजह से असुविधा हो रही है। इसका दबाव दिल्ली से नोएडा को जोड़ने वाले दूसरे रास्तों पर भी पड़ता है और लोगों को अपने गंतव्य पर पहुंचने में ज्यादा वक्त लग रहा है। दूसरी ओर, यह भी सही है कि देश के नागरिक अगर किसी मसले को लेकर आशंकित हैं तो उस पर विरोध जताना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है। ऐसे में अब लोगों की नजरें अदालत की ओर ही टिकी रहेंगी कि पर्याप्त विचार के बाद उसकी ओर से क्या निर्देश जारी किया जाता है, ताकि सबको अपना हक सुनिश्चित होता लगे।

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