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संपादकीयः सूचकांक के संकेत

यों शेयर बाजार में थोड़ा-बहुत उतार-चढ़ाव रोज की बात है, पर बुधवार को मुंबई के संवेदी सूचकांक ने जैसी छलांग लगाई उसे सामान्य नहीं कहा जा सकता। पहली बार सूचकांक तीस हजार के पार पहुंचा।

Author April 28, 2017 3:36 AM
सेंसेक्स (PTI Photo)

यों शेयर बाजार में थोड़ा-बहुत उतार-चढ़ाव रोज की बात है, पर बुधवार को मुंबई के संवेदी सूचकांक ने जैसी छलांग लगाई उसे सामान्य नहीं कहा जा सकता। पहली बार सूचकांक तीस हजार के पार पहुंचा। इसी दिन निफ्टी भी नई ऊंचाई पर पहुंच गया। हालांकि इससे पहले भी दो बार संवेदी सूचकांक ने तीस हजार के आंकड़े को छुआ था, पर वह वहां टिका नहीं रह सका। ऐसा पहली बार हुआ कि सूचकांक तीस हजार से ऊपर बंद हुआ। अलबत्ता दूसरे ही दिन यानी गुरुवार को सूचकांक एक सौ चार अंक लुढ़क गया। हालांकि गुुरुवार को बंद होने के समय भी सूचकांक तीस हजार के ऊपर कायम रहा, मगर एक दिन उसका ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच जाना और दूसरे ही दिन गिरावट का मुंह देखना शेयर बाजार की अस्थिर प्रकृति की ओर ही इशारा करता है। बुधवार का जोश दूसरे ही रोज क्यों ठंडा पड़ता मालूम हुआ? इसलिए कि वह जोश कंपनियों के नतीजों पर आधारित नहीं था, कुछ धारणाओं से प्रभावित था। जैसे ही कुछ दूसरी तरह की धारणाओं ने जोर पकड़ा, तेजी पर विराम लग गया। पर गुरुवार का ठिठकना छोड़ दें, तो इस साल अब तक शेयर बाजार का माहौल कुल मिलाकर उत्साहजनक ही रहा है। संस्थागत निवेश भी मजबूत हुआ है और खुदरा निवेशकों की रुचि भी बढ़ी है।

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जनवरी से अब तक सेंसेक्स ने करीब तेरह प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की है। इस साल सेंसेक्स में आई तेजी और डॉलर के मुकाबले रुपए के मजबूत होने से भारत का एम-कैप यानी बाजार-पूंजीकरण 1.94 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। दुनिया में केवल आठ देश ऐसे हैं जिनका एम-कैप भारत से ज्यादा है। सूचकांक को तीस हजार के पार पहुंचाने के पीछे कई कारक बताए जा रहे हैं। एक यह कि फ्रांस के राष्ट्रपति पद के चुनाव में इमैन्युएल मैक्रोन के जीतने के काफी आसार हैं, जो यूरोपीय संघ में बने रहने के पैरोकार हैं। पहले दौर के मुकाबले में उन्होंने नेशनल फ्रंट की उम्मीदवार मरीन ली पेन को पीछे छोड़ दिया, जो यूरोपीय संघ से अलग होने की वकालत करती रही हैं तथा आप्रवासियों के प्रति कठोर रुख के लिए जानी जाती हैं। तेजी के पीछे दूसरी वजह यह खबर रही कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कॉरपोरेट जगत को कंपनी-कर में कटौती का भरोसा दिलाया है। तीसरा कारण जीएसटी का रास्ता साफ होना भी है। फिर, अन्य एशियाई बाजारों के सकारात्मक रुझान ने भी असर डाला होगा, जो कि पूंजी बाजार में अमूमन होता ही है। लेकिन आर्थिक मामलों के अनेक जानकारों ने इस अपूर्व तेजी के टिकाऊ होने पर संदेह जताया है, क्योंकि पिछले तीन वर्षों में कंपनियों की आय में बढ़ोतरी कमजोर रही है।

फ्रांस में मैक्रोन के जीतने की संभावना बाजार-केंद्रित आर्थिक सुधारों के लिए अच्छा संकेत जरूर है, पर कंपनी-कर में कटौती के ट्रम्प के आश्वासन को लेकर अभी पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता, क्योंकि उनके इस तरह के प्रस्ताव का खुद उनकी पार्टी में विरोध हो सकता है। जीएसटी के बल पर वृद्धि दर बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है, पर जीएसटी के क्रियान्वयन की कठिनाइयों से पार पाने के बाद ही यह उम्मीद की जा सकती है। भारी एनपीए के कारण उद्योग जगत के लिए ऋणवृद्धि अब भी कमजोर है। मौद्रिक नीति में अब भी महंगाई की चिंता दिखती है। लिहाजा, शेयर बाजार के उछाल को ही सब कुछ मान लेना अति उत्साह होगा।

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