Opinion about RBI Monetary Policy Highlights Feb 2018 - Jansatta
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संपादकीयः सावधानी की मुद्रा

हर दो महीने पर मौद्रिक समीक्षा जारी करने से पहले रिजर्व बैंक को इस दुविधा से जूझना पड़ता है कि वह किसे अहमियत दे, वृद्धि दर को प्रोत्साहन देने वाले उपायों तथा बाजार की अपेक्षाओं को, या महंगाई नियंत्रण को।

Author February 9, 2018 2:32 AM
मौजूदा वित्तवर्ष की छठी और नई मौद्रिक समीक्षा से जाहिर है कि रिजर्व बैंक ने महंगाई नियंत्रण को प्राथमिकता दी है।

हर दो महीने पर मौद्रिक समीक्षा जारी करने से पहले रिजर्व बैंक को इस दुविधा से जूझना पड़ता है कि वह किसे अहमियत दे, वृद्धि दर को प्रोत्साहन देने वाले उपायों तथा बाजार की अपेक्षाओं को, या महंगाई नियंत्रण को। मौजूदा वित्तवर्ष की छठी और नई मौद्रिक समीक्षा से जाहिर है कि रिजर्व बैंक ने महंगाई नियंत्रण को प्राथमिकता दी है। पर उसने इस बात का भी खयाल रखा है कि बाजार के माहौल पर कोई प्रतिकूल असर न पड़े। रिजर्व बैंक ने पिछले साल अगस्त में रेपो दर को चौथाई फीसद घटा कर छह फीसद किया था। लेकिन तब से उसने लगातार तीसरी बार मुख्य नीतिगत दर यानी रेपो दर को छह फीसद पर यथावत रखा है। रेपो वह दर है जिस पर रिजर्व बैंक, बैंकों को अल्पावधि ऋण देता है।

रिवर्स रेपो दर, यानी जिस दर पर बैंक, रिजर्व बैंक के पास अपना जमा रखते हैं, को भी रिजर्व बैंक ने जस का तस, 5.75 फीसद पर बनाए रखा है। नीतिगत दरों को यथावत रखने का निर्णय रिजर्व बैंक की मौद्रिक समीक्षा समिति ने आम राय से किया। समिति ने रेपो तथा रिवर्स रेपो दरों में कोई फेरबदल न करने की जरूरत महसूस की, तो इसके कई कारण हैं।
दिसंबर में मुद्रास्फीति सत्रह महीनों के उच्चतम स्तर यानी 5.21 फीसद पर पहुंच गई। इसमें कोई राहत मिलने के आसार फिलहाल नहीं दिखते, बल्कि महंगाई का ग्राफ और चढ़ने की ही आशंका है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि का रुझान कायम है। भारत अपनी जरूरत या खपत का करीब तीन चौथाई तेल आयात करता है।

इसलिए कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोतरी से जहां एक ओर आयात का बिल बढ़ता है और फलस्वरूप व्यापार घाटे में बढ़ोतरी होती है, वहीं दूसरी तरफ, परिवहन तथा ढुलाई का खर्च बढ़ जाने से तमाम चीजों की कीमतें चढ़ने लगती हैं। फिर, राजकोषीय घाटा बढ़ने के अनुमान ने भी रिजर्व बैंक को सतर्क कर दिया। अनुमान है कि 2017-18 में राजकोषीय घाटा लक्ष्य से अधिक यानी साढ़े तीन फीसद रह सकता है। अगले वित्तवर्ष में इसके और बढ़ने का अंदेशा है। यों भी चुनावी साल में सरकार की प्राथमिकता वित्तीय प्रबंधन के बजाय लोक लुभावन योजनाओं पर आबंटन बढ़ाने की ज्यादा रहती है। रिजर्व बैंक ने मौजूदा वित्तवर्ष की आखिरी तिमाही में मुद्रास्फीति के 5.1 फीसद रहने का अनुमान लगाया है, और उसके मुताबिक, अगले वित्तवर्ष की पहली तिमाही में यह 5.1 फीसद से 5.6 फीसद के बीच होगी।

अगर राजकोषीय घाटा भी बढ़ने का अनुमान है और मुद्रास्फीति भी, तो अगले वित्तवर्ष की बाबत एक मोटा-सा अंदाजा लगाया जा सकता है। फिर भी, वित्त मंत्रालय से लेकर नीति आयोग तक, सारे नीति नियंता अगले वित्तवर्ष की सुनहरी तस्वीर पेश करने में कोई कसर नहीं रखते। मौद्रिक समीक्षा नीति के मुताबिक मुद्रास्फीति का परिदृश्य कई तरह की अनिश्चितताओं से घिरा हुआ है। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के क्रियान्वयन से पड़ने वाले असर, कच्चे तेल के ऊंचे दाम, सीमाशुल्क में बढ़ोतरी और राजकोषीय घाटे में वृद्धि आदि के चलते महंगाई के और विकट रूप लेने का अंदेशा है। जाहिर है, यह स्थिति चुनावी साल में सरकार के लिए चिंता का सबब बन सकती है। यह अलग बात है कि रिजर्व बैंक ने अगले वित्तवर्ष की दूसरी छमाही में मुद्रास्फीति में तनिक कमी आने का अनुमान जताया है।

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