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संपादकीयः सावधानी की मुद्रा

यह स्वाभाविक ही है कि अपनी मौद्रिक समीक्षा में रिजर्व बैंक इस बात का खयाल रखे कि नीतिगत दरों में कोई बदलाव किया जाएगा, तो उसका महंगाई पर क्या असर पड़ेगा।

Author December 8, 2017 02:54 am

यह स्वाभाविक ही है कि अपनी मौद्रिक समीक्षा में रिजर्व बैंक इस बात का खयाल रखे कि नीतिगत दरों में कोई बदलाव किया जाएगा, तो उसका महंगाई पर क्या असर पड़ेगा। इस तकाजे को ध्यान में रख कर ही रिजर्व बैंक ने एक बार फिर सावधानी बरतते हुए नीतिगत दरों में कोई बदलाव नहीं किया है। रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल की अध्यक्षता वाली मौद्रिक नीति समिति ने चालू वित्तवर्ष की पांचवीं दोमाही मौद्रिक समीक्षा में सर्वसम्मति से यह फैसला किया। इस तरह समिति ने रेपो दर को छह फीसद पर और रिवर्स रेपो दर को पौने छह फीसद पर बनाए रखा है। इस फैसले को हाल के आंकड़ों और निकट भविष्य के पूर्वानुमानों के मद््देनजर तर्कसंगत ही कहा जाएगा। अक्तूबर में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित खुदरा महंगाई दर सात महीनों के उच्चतम स्तर पर थी। फिर, कई ऐसे संकेत हैं जिनके आधार पर रिजर्व बैंक ने महंगाई बढ़ने का अनुमान जताया है। इनमें मुख्य आधार दो हैं। एक, कच्चे तेल की कीमतें, और दो, सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों का संभावित असर। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में इजाफे के ही आसार दिखते हैं, क्योंकि ओपेक यानी तेल उत्पादक देशों के संगठन ने अपनी हालिया बैठक में तेल के उत्पादन में कटौती बरकरार रखने का निर्णय किया है। भारत अपनी खपत का तीन चौथाई से भी अधिक तेल आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का दाम चढ़ना उसके घरेलू बाजार में महंगाई बढ़ने का सबब बनता है।

रिजर्व बैंक का यह भी मानना है कि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के असर से भी महंगाई में कुछ बढ़ोतरी हो सकती है। इसलिए उसने तीसरी और चौथी तिमाही के लिए मुद्रास्फीति के पहले के 4.2 फीसद से 4.6 फीसद के अपने अनुमान को बढ़ा कर 4.3 फीसद से 4.7 फीसद कर दिया है। जबकि रिजर्व बैंक ने मौजूदा वित्तवर्ष में महंगाई को चार फीसद या उसके आसपाससीमित रखने का लक्ष्य रखा है। यों कई बातें ऐसी हैं जिनसे मुद्रास्फीति में कमी आनी चाहिए। मसलन, शीतऋतु में सब्जियों-फलों की आवक बढ़ जाती है। दूसरे, पिछले दिनों कई राज्यों ने पेट्रोलियम पदार्थों पर उत्पाद शुल्क और वैट में कमी की है। तीसरे, केंद्र ने कई मदों में जीएसटी की दरें घटाई हैं। इन सब का सम्मिलित परिणाम महंगाई में राहत के रूप में आना चाहिए। लेकिन आरबीआइ गवर्नर समेत मौद्रिक नीति समिति के सदस्यों ने आकलन में पाया कि कई कारणों से, आने वाले दिनों में महंगाई से राहत के कोई आसार नहीं है, बल्कि महंगाई कुछ बढ़ ही सकती है।

यही नहीं, पेट्रोलियम पदार्थों पर लगने वाले शुल्कों में कमी और कई चीजों पर जीएसटी की दरें घटाए जाने के फलस्वरूप राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है। अगर राजकोषीय घाटे से फिक्रमंद होकर वे दरें फिर बढ़ाई गर्इं, तो चालू वित्तवर्ष के उत्तरार्ध में महंगाई रिजर्व बैंक के अनुमान से भी ज्यादा हो सकती है। बहरहाल, रिजर्व बैंक ने मोटे तौर पर अर्थव्यवस्था की सामान्य तस्वीर को सकारात्मक बताया है, यह कहते हुए कि अब ‘अर्थव्यवस्था की स्थिति सुधरने लगी है।’ सुधार का एक मुख्य लक्षण यह बताया गया है कि हालिया महीनों में ऋण की वृद्धि दर कुछ तेज हुई है। यह कहने के साथ ही, चालू वित्तवर्ष में वृद्धि दर 6.7 फीसद रहने के पहले के अपने अनुमान को रिजर्व बैंक ने हूबहू बरकरार रखा है।

पिछले कुछ महीनों में सरकार को अर्थव्यवस्था की हालत को लेकर कई बार तीखी आलोचना झेलनी पड़ी। निरंतर कई तिमाहियों से जीडीपी की वृद्धि दर में गिरावट आलोचना का आधार तो थी ही, आलोचना का एक बिंदु यह भी था कि सरकारी खर्च के बूते वृद्धि दर को संभालने की कोशिश की जा रही है, जबकि निजी निवेश सिकुड़ रहा है, या ठहरा हुआ है। ऋण की वृद्धि दर में तेजी दो बातों की तरफ इशारा करती है। एक तो यह कि सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के सरकार के फैसले से ऋण देने की इन बैंकों की क्षमता बढ़ी है। दूसरे, निवेशकों का भरोसा भी बहाल हुआ है। पर आगामी दो तिमाहियों में जीडीपी वृद्धि दर में इजाफे के अनुमान के बरक्स कुछ चिंताजनक तथ्य भी हैं। ताजा मौद्रिक समीक्षा बताती है कि खरीफ की पैदावार और रबी की बुआई में कमी से कृषि क्षेत्र के परिदृश्य के नीचे की ओर जाने का जोखिम है। हमारे नीति नियामकों को कृषि की चिंता तभी सताती है जब उससे जीडीपी का ग्राफ नीचे आने का डर हो। लेकिन आज जरूरत इस बात की है कि किसानों की हालत कृषि की चिंता के केंद्र में हो।

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