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संपादकीयः गरीब का चेहरा

यह बात काफी समय से कही जाती रही है कि भारत में सामाजिक पिछड़ापन और आर्थिक वंचना एक दूसरे से काफी हद तक जुड़े हुए हैं।
Author March 23, 2018 02:56 am
बुधवार को सरकार ने लोकसभा में एक सवाल के जवाब में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के गरीबी रेखा से नीचे जी रहे लोगों की बाबत जो आंकड़े पेश किए वे उपर्युक्त हकीकत की ही पुष्टि करते हैं।

यह बात काफी समय से कही जाती रही है कि भारत में सामाजिक पिछड़ापन और आर्थिक वंचना एक दूसरे से काफी हद तक जुड़े हुए हैं। बुधवार को सरकार ने लोकसभा में एक सवाल के जवाब में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के गरीबी रेखा से नीचे जी रहे लोगों की बाबत जो आंकड़े पेश किए वे उपर्युक्त हकीकत की ही पुष्टि करते हैं। सरकार की ओर से बताया गया कि अनुसूचित जनजाति के 45.3 फीसद और अनुसूचित जाति के 31.5 फीसद लोग बीपीएल यानी गरीबी रेखा से नीचे हैं। देश की आबादी में दलित पंद्रह से सोलह फीसद और आदिवासी सात से आठ फीसद हैं। लेकिन जब बीपीएल के आंकड़े पर आते हैं, तो इनका हिस्सा देश में अपनी आबादी के अनुपात में बहुत ज्यादा दिखता है, जो कि कोई हैरानी की बात नहीं है। सरकार ने जो तथ्य बताए वे पहले हुए विभिन्न सर्वेक्षणों से भी मेल खाते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में इक्कीस से बाईस फीसद लोग या परिवार बीपीएल हैं। लेकिन दलितों में बीपीएल अनुपात देश के औसत से कोई दस फीसद अधिक है, और आदिवासियों में तो यह देश के औसत से दो गुने से भी कुछ ज्यादा है। यह स्थिति इसी सच्चाई की ओर इशारा करती है कि सामाजिक श्रेणीबद्धता काफी हद तक आर्थिक स्थिति का निर्धारण करती है।

हम जानते हैं कि दलितों के साथ सदियों से कैसा व्यवहार होता रहा है। वे छुआछूत समेत तमाम तरह के सामाजिक भेदभाव के शिकार रहे हैं। ऐसे में अच्छी आय वाले व सम्मानजनक रोजगार पाना उनके लिए हमेशा बहुत कठिन रहा है। यही बात आदिवासियों के बारे में भी कही जा सकती है। अगर दलितों व आदिवासियों में कुछ लोग सम्मानजनक पदों पर पहुंच सके और अच्छी आमदनी की गारंटी पा सके, तो उसका श्रेय आरक्षण को जाता है। लेकिन आरक्षण का लाभ कभी भी व्यापक नहीं हो सकता, यह हमेशा थोड़े-से लोगों तक सिमटा रहेगा। इसलिए सभी आरक्षित वर्गों में और दलितों व आदिवासियों में तो खासकर आरक्षण से लाभान्वित तबके और बाकी लोगों के बीच काफी गैर-बराबरी दिखाई देती है। इसका अर्थ यह नहीं कि उन्हें मिलने वाला आरक्षण खत्म कर दिया जाए, बल्कि इसका अर्थ यह है कि आरक्षण उनके सशक्तीकरण का एक अपर्याप्त उपाय है; उनकी बेहतरी के अवसरों के लिए और भी कदम उठाने होंगे।

अधिकांश दलित असंगठित क्षेत्र के श्रमिक हैं जहां गुजारे लायक और सतत आय की गारंटी नहीं होती। कृषि मजदूरों में अधिकतर दलित हैं। लेकिन खेती की हालत यह है कि वह लंबे समय से घाटे का धंधा बनी हुई है। ऐसे में वे बेहतर आय की आस कहां से करें? यही बात शहर में दिहाड़ी मजदूर की बाबत भी कही जा सकती है। जंगलों की व्यावसायिक कटाई और विभिन्न परियोजनाओं के नाम पर वनभूमि से बेदखल किए जाने से आदिवासियों की हालत और बदतर हुई है। वनोपज इकट्ठा कर जीने का सहारा भी लाखों आदिवासियों से छिन चुका है। इस तरह हम देखते हैं कि बीपीएल की तस्वीर सिर्फ गरीबी की नहीं है बल्कि वह अशिक्षा, भूमिहीनता, विस्थापन और सामाजिक भेदभाव आदि की भी है। यह भी गौरतलब है कि बीपीएल का सरकारी आंकड़ा अंतरराष्ट्रीय मापदंडों के अनुरूप नहीं है। वैश्विक पैमाने को लागू करें तो भारत में बीपीएल का आंकड़ा बहुत अधिक निकलेगा। फिर, दलितों व आदिवासियों की हालत और भी बदतर दिखाई देगी।

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