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संपादकीयः खालिदा के खिलाफ

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया आखिरकार जेल भेज दी गर्इं। भ्रष्टाचार के एक मामले में अदालत ने उन्हें दोषी करार दिया और पांच साल की सजा सुनाई।
Author February 10, 2018 03:57 am
खालिदा जिया

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया आखिरकार जेल भेज दी गर्इं। भ्रष्टाचार के एक मामले में अदालत ने उन्हें दोषी करार दिया और पांच साल की सजा सुनाई। जैसा कि अंदेशा था, खालिदा जिया के खिलाफ फैसला आते ही उनके हजारों समर्थक सड़कों पर उतर आए। कई जगह पुलिस से उनकी झड़पें भी हुर्इं। यह अप्रत्याशित नहीं था। सरकार को अनुमान था कि खालिदा जिया के जेल जाने की नौबत आएगी, तो बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हो सकते हैं। हिंसा भी फूट सकती है। इसलिए सुरक्षा बलों की व्यापक तैनाती की गई थी। खालिदा जिया पर एक अनाथालय के लिए मिले दो लाख बावन हजार डॉलर (2.1 करोड़ टका) की रकम के गबन का आरोप था। इस मामले में खालिदा के बेटे और अन्य चार को भी दस साल की सजा हुई है। खालिदा के वकील ने ऊपरी अदालत में अपील करने की बात कही है। अपील में क्या होगा, उनकी सजा बरकरार रहेगी, या वे खुद को निर्दोष साबित कर पाएंगी, यह सब ऊपरी अदालत का फैसला आने पर ही जाना जा सकेगा। लेकिन यह तो साफ है कि खालिदा का जेल जाना बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास की एक बड़ी घटना है। यों वे पहली बार जेल नहीं गई हैं। पर भ्रष्टाचार के आरोप में उन्हें पहली बार सजा सुनाई गई है।

खालिदा और उनके तमाम समर्थकों का आरोप है कि यह मामला राजनीतिक विद्वेष की देन है। जाहिर है, वे इसे सियासी रंग देने की भरपूर कोशिश करेंगे, यानी प्रधानमंत्री शेख हसीना को निशाना बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। इसी साल दिसंबर में बांग्लादेश में संसदीय चुनाव होने हैं। खालिदा जिया अदालत से पांच साल के लिए दोषी करार दिए जाने के बाद खुद तो चुनाव लड़ने की पात्रता गंवा ही बैठी हैं, वे अपनी पार्टी के लिए चुनाव प्रचार भी नहीं कर पाएंगी। जाहिर है, ऐसी स्थिति में शेख हसीना और उनकी पार्टी अवामी लीग को काफी सहूलित होगी, और शायद एक बार फिर सत्ता में उनकी वापसी हो जाए। लेकिन अगर खालिदा जिया की पार्टी बीएनपी यानी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने, जो कि विपक्ष की मुख्य पार्टी है, संसदीय चुनावों का बहिष्कार कर दिया, जैसा कि उसने 2013 में किया था, तो आम चुनाव एक औपचारिकता ही रह जाएंगे, उनकी विश्वसनीयता सवालों के घेरे में होगी।

शेख हसीना ने अपने दूसरे कार्यकाल में आतंकवाद और कट्टरपंथी हिंसा पर नकेल कसने में काफी कामयाबी दर्ज की है, पर दूसरी तरफ उन्होंने राजनीतिक असहमतियों को बेरहमी से कुचला है, लोकतांत्रिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक प्रणालियों की अवहेलना की है। उनकी लोकप्रियता में कमी आते जाने की एक खास वजह यह भी है। ऐसे में पांच साल कैद की सजा खालिदा के लिए सहानुभूति बटोरने का जरिया भी बन सकती है। जमात-ए-इस्लामी से बीएनपी के गठजोड़ पर शेख हसीना बार-बार सवाल उठाती रही हैं, यह कहते हुए कि जमात-ए-इस्लामी के कई सदस्यों ने बांग्लादेश के मुक्तियुद्ध के समय दुश्मन यानी पाकिस्तान का साथ दिया था। इस आरोप को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन ऐसा नहीं लगना चाहिए कि खालिदा को इसकी सजा दी जा रही है। भ्रष्टाचार के किसी मामले को राजनीतिक रंग न दिया जा सके, यह तभी हो सकता है जब देश के लोगों को यह पक्का भरोसा हो कि जांच एजेंसियों से लेकर अदालतों तक, सारी संस्थाएं बिना किसी दबाव के, और पूरी निष्पक्षता से काम कर रही हैं। विडंबना यह है कि यह भरोसा पिछले कुछ वर्षों में कमजोर हुआ है।

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