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संपादकीयः लापरवाही की दीवारें

एक महीने के भीतर यह दूसरी बार है जब श्रीनगर के केंद्रीय कारागार की चारदिवारी के भीतर से आतंकवादी संगठनों को मदद पहुंचाए जाने के सुराग मिले हैं।

Author March 14, 2018 02:37 am

एक महीने के भीतर यह दूसरी बार है जब श्रीनगर के केंद्रीय कारागार की चारदिवारी के भीतर से आतंकवादी संगठनों को मदद पहुंचाए जाने के सुराग मिले हैं। इसके साथ ही यह सवाल फिर से उठा है कि आखिर जेल महकमे के तंत्र की निगरानी और जांच की यह कैसी व्यवस्था है कि कुछ कैदियों को वहां आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली सामग्री ले जाने और उसके इस्तेमाल में कोई अड़चन नहीं आती? गौरतलब है कि सोमवार को श्रीनगर के केंद्रीय कारागार में एनआइए यानी राष्ट्रीय जांच एजंसी के अचानक छापे के दौरान पच्चीस मोबाइल फोन, कुछ डिजिटल कार्ड, पेन ड्राइव जैसे कंप्यूटर से जुड़े अन्य सामान और कई दस्तावेजों के अलावा पाकिस्तानी झंडा और आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने वाला साहित्य जब्त किया गया। दरअसल, कुपवाड़ा में गिरफ्तार दो युवकों ने दावा किया था कि प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन अल बद्र के नए रंगरूटों को हथियारों के प्रशिक्षण के लिए भेजा जा रहा है, जिसकी साजिश श्रीनगर के केंद्रीय कारागार में ही रची गई। इसी सिलसिले में एनआइए की टीमों ने जेल की सघन तलाशी ली।

जिस पैमाने पर यह सामान मिला, उससे इस आशंका को बल मिलता है कि जेल के भीतर उन्हें ऐसी सुविधाएं मुहैया कराने में वहां के सुरक्षाकर्मियों या अधिकारियों की मिलीभगत हो सकती है। वरना किसी अति सुरक्षित जेल में कैदियों के पास ऐसा सामान आसानी से कैसे पहुंच सकता है! यह स्थिति ज्यादा गंभीर इसलिए भी लगती है कि हाल ही में एक आधिकारिक रिपोर्ट में पता चला था कि श्रीनगर की केंद्रीय जेल में ही गैरकानूनी रूप से करीब तीन सौ मोबाइल फोन इस्तेमाल किए जा रहे हैं और इनके जरिए वहां मामूली अपराध में बंद या विचाराधीन कैदियों को कट्टरपंथ का पाठ पढ़ाया जा रहा है। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की समस्या किस स्तर तक जटिल हो चुकी है, यह किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में अगर वहां की जेलों में बंद कैदियों पर भी प्रशासन का नियंत्रण नहीं है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्थिति किस हद तक गंभीर है। सवाल है कि जिन जेलों की सुरक्षा व्यवस्था के चाक-चौबंद होने के दावे करते हुए कहा जाता है कि यहां एक चिड़िया भी पर नहीं मार सकती, वहां गैरकानूनी तरीके से इतनी बड़ी तादाद में अवांछित चीजें कैसे पहुंच जाती हैं?

जेलों को चूंकि सुधार गृह के तौर पर भी देखा जाता है, इसलिए आमतौर पर उम्मीद की जाती है कि साधारण अपराधों में बंद या फिर विचाराधीन कैदियों में से ज्यादातर बाहर से आने के बाद मुख्यधारा में शामिल होकर सामान्य नागरिक की तरह जीवन गुजारेंगे। लेकिन अगर ऐसे लोगों को जेलों में ही आतंकवाद का पाठ पढ़ाने या फिर इस तरह की गतिविधियों में शामिल होने की जमीन बनाने वालों के भरोसे छोड़ दिया जाता है, तो उनसे क्या उम्मीद की जाएगी! हालांकि जेलों में कुछ कैदियों के गैरकानूनी तरीके से मोबाइल, टीवी या दूसरे संसाधन हासिल कर लेने के मामले देश भर की कई जेलों में सामने आते रहते हैं। लेकिन अगर श्रीनगर की केंद्रीय जेल में कुछ दिनों के भीतर दो बार एक ही तरह के मामले पकड़ में आए, तो उसे किस तरह देखा जाएगा? यह ध्यान रखने की जरूरत है कि इस तरह की कोताही इसलिए भारी पड़ सकती है कि किसी एक आतंकी को गिरफ्तार करने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है। अगर जेल के भीतर भी आतंक का दायरा बढ़ रहा हो तो अंतिम सवाल जेल प्रशासन पर ही उठेंगे!

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