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संपादकीयः सुरक्षा का मोर्चा

भारत को हथियार और रक्षा संबंधी साजो-सामान निर्माण का बड़ा केंद्र बनाने की दिशा में सरकार ने जो कदम बढ़ाए हैं वे महत्त्वपूर्ण तो हैं ही, वक्त की जरूरत को भी रेखांकित करते हैं।
Author April 14, 2018 01:54 am
चेन्नई में रक्षा प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने देश की तीनों सेनाओं को और सशक्त बनाने का संकल्प दोहराया। प्रधानमंत्री ने रक्षा उत्पादन और खरीद प्रक्रिया में नीतिगत बदलाव लाने का जो संकेत दिया है उससे सरकारी, निजी और विदेशी कंपनियों को समान अवसर मिल सकेंगे।

भारत को हथियार और रक्षा संबंधी साजो-सामान निर्माण का बड़ा केंद्र बनाने की दिशा में सरकार ने जो कदम बढ़ाए हैं वे महत्त्वपूर्ण तो हैं ही, वक्त की जरूरत को भी रेखांकित करते हैं। चेन्नई में रक्षा प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने देश की तीनों सेनाओं को और सशक्त बनाने का संकल्प दोहराया। प्रधानमंत्री ने रक्षा उत्पादन और खरीद प्रक्रिया में नीतिगत बदलाव लाने का जो संकेत दिया है उससे सरकारी, निजी और विदेशी कंपनियों को समान अवसर मिल सकेंगे। इससे देश में ही रक्षा साजो-सामान बनाने के लिए तीनों क्षेत्रों की कंपनियां प्रतिस्पर्धी बन कर उतर सकेंगी। भारत अपने लिए तो छोटे-बड़े हथियार बनाएगा ही, अब दूसरे देशों के साथ भागीदारी कर उनके लिए भी रक्षा क्षेत्र में काम भी करेगा। रक्षा प्रदर्शनी में पांच सौ भारतीय और डेढ़ सौ विदेशी कंपनियों की शिरकत इस बात का सबूत है कि भारत रक्षा बाजार बनने की दिशा में बढ़ चुका है। अमेरिकी हथियार कंपनी लॉकहीड मार्टिन ने तो एफ-16 लड़ाकू विमान निर्माण का काम भारत लाने में दिलचस्पी दिखाई है। इसके अलावा जैवलिन मिसाइल बनाने की तकनीक भी भारत को हासिल हो सकती है। यह सामरिक और कारोबारी दृष्टि से भारत के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है।

भारत के लिए देश में ही हथियारों और रक्षा उत्पादों का निर्माण इसलिए जरूरी हो गया है कि सीमा पर तैनात जवानों को लंबे समय से छोटे हथियारों की कमी से जूझना पड़ रहा है। चार हजार किलोमीटर लंबी सीमा और हिंद महासागर में चीन की बढ़ती गतिविधियां चिंता का विषय हैं। डोकलाम की घटना के बाद यह खतरा और बढ़ गया है। पाकिस्तान के साथ भी भारतीय सीमा काफी लंबी है और सीमा पार आतंकवाद की वजह से यहां तैनात जवानों को छोटे हथियारों की सख्त जरूरत है। हालांकि कुछ महीने पहले ही रक्षामंत्री की अध्यक्षता वाली रक्षा खरीद समिति ने करीब सोलह हजार करोड़ रुपए की खरीद को हरी झंडी दी है।

सैनिकों के संख्या बल और हथियारों के जखीरे के हिसाब से चीन के बाद दूसरे नंबर पर भारत की सेना आती है। ऐसे में यह गंभीर सवाल खड़ा होता है कि इतनी बड़ी सेना होने के बावजूद हमारे जवानों के पास आधुनिक हथियार क्यों नहीं हैं। क्यों उन्हें पुराने घिसे-पिटे हथियारों से लड़ना पड़ रहा है? रक्षा मामलों पर संसद की स्थायी समिति भी सेना में हथियारों की कमी पर चिंता जता चुकी है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि सेना का अड़सठ फीसद साजो-समान संग्रहालय में रखने लायक हो गया है। केवल चौबीस फीसद साजो-समान इस्तेमाल करने लायक है। सेना के पास मात्र आठ फीसद ऐसे हथियार और उपकरण हैं, जिन्हें पूरी तरह अत्याधुनिक कहा जा सकता है। इसकी असल वजह सेना का एक तरह से खजाना खाली होना है। जरूरत के हिसाब से सेना को जितना बजट मिलना चाहिए, वह नहीं मिल रहा है। इसका सीधा असर सेना के आधुनिकीकरण पर पड़ रहा है। सेना की सवा सौ परियोजनाओं के लिए उनतीस हजार करोड़ रुपए की जरूरत है। नई योजनाओं के लिए खजाना खाली है। ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत पच्चीस परियोजनाएं हैं, लेकिन उन पर काम करने के लिए पर्याप्त बजट नहीं है। ऐसे में गंभीर सवाल है कि अगर सेना के पास पर्याप्त पैसा ही नहीं होगा तो कैसे रक्षा परियोजनाएं सिरे चढ़ पाएंगी और कैसे हम अपनी रक्षा क्षमताओं को बढ़ा पाएंगे!

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