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संपादकीयः राष्ट्रगान की गरिमा

तकरीबन सवा साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमाघरों में फिल्म के प्रदर्शन से पहले परदे पर राष्ट्रध्वज के साथ राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य किया था।

Author January 11, 2018 3:13 AM
सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान करते लोग (express PHOTO)

तकरीबन सवा साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमाघरों में फिल्म के प्रदर्शन से पहले परदे पर राष्ट्रध्वज के साथ राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य किया था। पर उसके कई अन्य पहलुओं पर तभी से बहस चल रही थी कि फिल्मों के पहले राष्ट्रगान बजाने और उसके सम्मान में लोगों के खड़े होने की शर्त कितनी व्यावहारिक होगी। इस बीच कई जगहों से इस मसले पर विवाद की खबरें भी आर्इं। इसी स्थिति के मद्देनजर अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले पर पुनर्विचार किया और मंगलवार को उसमें संशोधन करते हुए आदेश जारी किया कि अब फिल्मों से पहले राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य नहीं, स्वैच्छिक होगा। हालांकि इस मसले पर खुद केंद्र सरकार ने भी हलफनामा दाखिल कर अदालत से उस फैसले से पहले की स्थिति बहाल करने का आग्रह किया था। जाहिर है, सिनेमाघरों में फिल्म प्रदर्शन के पहले राष्ट्रगान के मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी राय साफ कर दी है। अब इस मुद्दे पर बारह सदस्यों वाली अंतर-मंत्रालयी समिति विचार करेगी और अगले छह महीने में अपने सुझाव पेश करेगी।

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इसी संदर्भ में एक मामले की सुनवाई के दौरान पिछले साल चौबीस अक्तूबर को अदालत ने कुछ महत्त्वपूर्ण राय जाहिर की थी, जिसके मुताबिक लोगों को अपनी राष्ट्रभक्ति साबित करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। यह नहीं माना जा सकता कि अगर कोई व्यक्ति राष्ट्रगान बजाए जाने के दौरान खड़ा नहीं होता तो उसकी राष्ट्रभक्ति में कमी है। दरअसल, जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत सिनेमाघरों में फिल्मों के पहले राष्ट्रगान और उस वक्त लोगों के खड़ा होने का नियम अनिवार्य किया गया था, तो कई अप्रिय घटनाएं सामने आई थीं। राष्ट्रगान के दौरान मजबूरीवश खड़ा नहीं हो पाने वाले किसी दर्शक से न केवल दुर्व्यवहार किया गया, बल्कि कुछ के साथ मारपीट भी की गई। इस स्थिति की विडंबना तब ज्यादा अफसोसनाक शक्ल में सामने आई जब पांवों से लाचार एक विकलांग व्यक्ति को भी राष्ट्रगान के दौरान खड़ा न हो पाने के बदले हिंसक बर्ताव झेलना पड़ा। हालांकि इस बात की आशंका पहले से थी कि भावनाओं से जुड़े किसी भी मामले में जबरन थोपा गया व्यवहार अपेक्षित नतीजे नहीं देगा।

यों भी राष्ट्रगान सहित देश के लिए अपनी भावनाएं जाहिर करने के सभी प्रतीकों के प्रति सम्मान जताना सामाजिक व्यवहार का सहज और स्वाभाविक हिस्सा होना चाहिए। पर सिनेमा घरों में मनोरंजन के लिए जाने वाले लोग कई बार ऐसे विषय पर बनी फिल्में देखते हैं, जिनका राष्ट्रभक्ति से कोई लेना-देना नहीं होता या फिर राष्ट्र के प्रति भावनाएं भी मनोरंजन के मौके में घुल-मिल जाती हैं। जबकि राष्ट्रगान के समय कुछ तय नियम-कायदे या औपचारिकताएं हैं और उनका खयाल रखा जाना चाहिए। यह अंदाजा लगाना सहज है कि सिनेमा घरों में फिल्म के पहले या फिर मनोरंजन के माहौल में उन नियमों का कितना पालन होता होगा। इस संदर्भ में अदालत की यह टिप्पणी गौरतलब है कि अगली बार सरकार चाहेगी कि लोग सिनेमाघरों में टी-शर्ट और हल्के कपड़े पहन कर आना बंद कर दें, क्योंकि उससे राष्ट्रगान का अनादर होता है। यों भी, राष्ट्रगान या देश के प्रति निष्ठा जताना भावनाओं से जुड़ा मामला है और इसकी गरिमा बनी रहनी चाहिए। बिना किसी खास वजह के बेमौके या फिर मनोरंजन के माहौल में राष्ट्रगान की अनिवार्यता से इसके प्रति भावनाओं की गंभीरता में कमी आएगी। इसलिए कोशिश यह होनी चाहिए कि राष्ट्र से जुड़े प्रतीकों की अहमियत और उसके प्रति सम्मान का भाव बरकरार रह

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