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संपादकीयः मालदीव का संकट

उस वक्त मालदीव का राजनीतिक संकट चरम पर पहुंच गया जब राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने पंद्रह दिनों के लिए आपातकाल की घोषणा कर दी।

Author February 7, 2018 04:57 am
मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने पंद्रह दिनों के लिए आपातकाल की घोषणा की है।

उस वक्त मालदीव का राजनीतिक संकट चरम पर पहुंच गया जब राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने पंद्रह दिनों के लिए आपातकाल की घोषणा कर दी। इसी के साथ उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम को गिरफ्तार कर लिया। एक अन्य पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद पहले से ही जेल में हैं। इस तरह मालदीव की ताजा स्थिति यह है कि वहां विपक्ष के सारे राजनीतिक जेल में हैं, सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का पालन करने से मना कर दिया है, आपातकाल की घोषणा के साथ ही सारे नागरिक अधिकार निलंबित कर दिए गए हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने सर्वोच्च न्यायालय का फैसला न मानने और आपातकाल थोपे जाने पर तीखी प्रतिक्रिया जताई है, पर फिलहाल कहना मुश्किल है कि मालदीव में लोकतंत्र कब बहाल होगा। मालदीव एक ऐसा देश है जिसे बहुत थोड़े वक्त के लिए ही लोकतंत्र का स्वाद मिल पाया है। 1978 तक वहां लगातार मौमून अब्दुल गयूम की तानाशाही सरकार रही, जिन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में भी अपने पिछलग्गू लोगों को भर रखा था। उनके बाद मोहम्मद नाशीद देश के राष्ट्रपति बने और उनके नेतृत्व में पहली चुनी हुई सरकार गठित हुई। साथ ही, नया संविधान बना और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के भी कुछ प्रावधान किए गए।

बहरहाल, मालदीव के सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले दिनों पूर्व राष्ट्रपति नाशीद और पूर्व उपराष्ट्रपति अहमद अदीब समेत कई राजनीतिक बंदियों की रिहाई का आदेश दिया था। न्यायालय ने इन पर लगाए गए आतंकवाद तथा अन्य आरोपों को बेबुनियाद और राजनीतिक विद्वेष से प्रेरित ठहराया। इसके अलावा अदालत ने पिछले दिनों विपक्ष के उन बारह सांसदों की सदस्यता बहाल करने का फैसला भी सुनाया जिनकी सदस्यता छीन ली गई थी। अदालत के दोनों फैसलों ने राष्ट्रपति यामीन की नींद उड़ा दी। उन्हें यह भय सता रहा था कि अगर सदस्यता बहाल करने का फैसला लागू होने की सूरत में, यानी बारह की संख्या और जुड़ गई तो संसद में विपक्ष का बहुमत हो जाएगा, और वह उन पर महाभियोग चलाने की स्थिति में आ जाएगा। राजनीतिक बंदियों की रिहाई भी उन्हें मंजूर नहीं थी। इसलिए वे सर्वोच्च न्यायालय से भी टकरा गए। यामीन का कहना है कि न्यायालय ने अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है। पर चाहे बारह सांसदों की सदस्यता बहाल करने का फैसला हो या राजनीतिक बंदियों की रिहाई का, अदालत ने तो बस मनगढ़ंत आरोपों को खारिज किया है। इसे कार्यपालिका के कामकाज में दखलंदाजी नहीं कहा जा सकता। इसलिए अमेरिका, ब्रिटेन, श्रीलंका और यूरोपीय संघ ने उचित ही यह सलाह दी कि राष्ट्रपति यामीन सर्वोच्च अदालत के फैसलों का सम्मान करें। भारत ने भी यही कहा।

लेकिन यामीन को इन देशों की सलाह रास नहीं आई, क्योंकि इस सलाह पर अमल करने में उन्हें सत्ता से अपनी विदाई दिखी होगी। इस तरह, वे तीन-तिकड़म से अपनी जो तानाशाही चला रहे थे उसे उन्होंने अब बिलकुल औपचारिक रूप दे दिया है। कहने को आपातकाल महज पंद्रह दिनों के लिए लगाया गया है, पर इस बात की संभावना बहुत कम है कि पंद्रह दिनों बाद यह हटा लिया जाएगा। आशंका यही है कि बंदिशें और कड़ी की जाएंगी। मालदीव जैसे एक बहुत छोटे-से देश के राष्ट्रपति के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव से निपट पाना बहुत मुश्किल होगा। इसलिए अंदेशा यह भी है कि चीन इस मौके का फायदा उठा कर मालदीव में अपनी पैठ बढ़ा सकता है।

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