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संपादकीयः हिंसा की लपटें

पुणे में भीमा-कोरेगांव युद्ध के दो सौ साल पूरे होने के मौके पर हुई हिंसा के असर में अगर समूचे महाराष्ट्र में जनजीवन बाधित हुआ, तो इसकी सीधी जिम्मेदारी राज्य सरकार पर आनी चाहिए।
Author January 4, 2018 02:57 am
हिंसा के असर में अगर समूचे महाराष्ट्र में जनजीवन बाधित हुआ

पुणे में भीमा-कोरेगांव युद्ध के दो सौ साल पूरे होने के मौके पर हुई हिंसा के असर में अगर समूचे महाराष्ट्र में जनजीवन बाधित हुआ, तो इसकी सीधी जिम्मेदारी राज्य सरकार पर आनी चाहिए। भीमा-कोरेगांव स्थित ‘कोरेगांव स्तंभ’ पर अपनी भावनाएं प्रदर्शित करने हर साल बहुत सारे लोग आते रहे हैं। इस साल एक जनवरी को इस युद्ध की दो सौवीं बरसी के मौके पर पहले से स्पष्ट था कि वहां पहुंचने वाले लोगों की तादाद काफी बड़ी होगी। पर उसके मद्देनजर सुरक्षा के इंतजाम इस कदर नाकाफी थे कि कुछ उपद्रवियों ने वहां जा रहे लोगों पर र्इंट-पत्थरों से हमला किया, कई दर्जन वाहनों को नुकसान पहुंचाया। उस हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हो गई। फिर उस हमले के विरोध में कई संगठनों ने बुधवार को महाराष्ट्र बंद का आह्वान किया और उससे समूचा राज्य प्रभावित हुआ। अब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने घटना की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए हैं और यह भी कहा कि इसका पता लगाने की जरूरत है कि एक जनवरी की हिंसा के पीछे क्या कोई साजिश थी।

निश्चित रूप से इस पूरे प्रकरण में दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। पर वह आगे की प्रक्रिया है। सवाल है कि जब किसी मौके पर कहीं लाखों लोगों की जुटान हो, उस पूरे इलाके में सरकार को पुलिस और सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम करना जरूरी क्यों नहीं लगा? हमला करने वाले आखिर किस वजह से इतने आश्वस्त थे कि काफी देर तक र्इंट-पत्थर चलाते रहे, वाहनों की तोड़फोड़ करते रहे, लेकिन उन्हें रोकने या मौके पर पकड़ने के लिए पर्याप्त संख्या में पुलिसकर्मी तैनात नहीं थे? गौरतलब है कि एक जनवरी 1818 को भीमा-कोरेगांव में अंग्रेजों और पेशवा की सेना के बीच युद्ध हुआ था। उसमें कई गुना ज्यादा संख्या में होने के बावजूद पेशवा की सेना को हार का सामना करना पड़ा था। अंग्रेजों की सेना में तब काफी संख्या में दलित समुदाय के लोग शामिल थे। उसी युद्ध में मारे गए लोगों की स्मृति में कोरेगांव-स्तंभ बनाया गया था, जहां आज भी दलित समुदाय के लोग सम्मान जताने जाते हैं। इस साल इसमें दूसरी जातियों के लोग भी काफी संख्या में शामिल थे।

यह अलग बहस का विषय है कि उस दौर में भारत का क्या स्वरूप था, पेशवा के शासनकाल में कमजोर तबके के लोगों की क्या स्थिति थी और उस समय अंग्रेजों की सेना में शामिल होने को वर्तमान समय में कैसे देखा जाए। सवाल यह है कि अगर कोई समुदाय किसी घटना-विशेष को अपने नजरिए से देखता है, तो उस पर लोकतांत्रिक तरीके से सहमति या असहमति जताने के बजाय हिंसा के जरिए उन्हें रोकने की कोशिश कितना उचित है! फिर लाखों लोगों के वहां जाने की सूचना पहले से होने के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर सुरक्षा-व्यवस्था में लापरवाही बरती गई। किसी घटना के बारे में समाज के अलग-अलग हिस्से में भिन्न राय या मान्यता हो सकती है। उसके प्रति भावनाओं की अभिव्यक्ति के भी कई स्तर हो सकते हैं। लेकिन एक लोकतांत्रिक समाज और देश में हिंसा का सहारा लेकर किसी को बाधित करने की प्रवृत्ति को रोकना सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए। खासतौर पर भारत जिस तरह जातियों या समुदायों की विविधता की खासियत से भरा देश रहा है, उसमें सरकारों को वे तमाम उपाय करने चाहिए, जिनसे जातिगत या सामुदायिक दूरी और हिंसा को बढ़ावा न मिले, बल्कि उसे खत्म करने में मदद मिले।

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