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संपादकीयः नाहक दखल

अमेरिका में चुनाव की सरगर्मी है। पिछले दिनों भारतीय प्रधानमंत्री जब अमेरिका दौरे पर गए थे और वहां हाउडी मोदी कार्यक्रम में उन्होंने ट्रंप की खुल कर तारीफ की थी। उसके बाद से माना जाने लगा कि भारतीय प्रधानमंत्री के आह्वान से अमेरिका में रह रहे भारतीय मूल के लोगों पर असर पड़ेगा और वे ट्रंप को दुबारा राष्ट्रपति बनाने का निर्णय करेंगे। यह स्वाभाविक ही बर्नी सैंडर्स जैसे विपक्षी नेताओं को नागवार गुजरा होगा।

Author Published on: February 29, 2020 1:38 AM
अमेरिकी विपक्षी दल के नेता बर्नी सैंडर्स ने जिस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति को सवालों के घेरे में लिया है कि यह मानवाधिकार उल्लंघन का मामला था, ट्रंप से इस पर सख्त रुख अपनाने की अपेक्षा की जाती थी। सैंडर्स के इस बयान के पीछे छिपी उनकी मंशा को समझना मुश्किल नहीं है।

दिल्ली में हुई हिंसा को लेकर जिस तरह कुछ विदेशी अखबारों और नेताओं ने भारत की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया, उस पर भारत सरकार ने उचित ही सख्त रवैया अपनाया है। सुरक्षा व्यवस्था किसी भी देश का निजी मामला होता है और दंगे-फसाद जैसी घटनाओं से कैसे निपटना है, उस पर फैसले भी वहां की सरकार को करने होते हैं। ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए उपाय भी उसे ही तलाशने होते हैं। फिर दिल्ली का दंगा ऐसा कोई मामला नहीं था, जिस पर विदेशी नेताओं को बयान देने की जरूरत पड़े। मगर चूंकि उन्हीं दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ड्रंप भारत दौरे पर थे, जब दिल्ली में हिंसा भड़की थी, सो कुछ नेताओं को इस बहाने उन्हें घेरने का मौका मिल गया। खासकर अमेरिकी विपक्षी दल के नेता बर्नी सैंडर्स ने जिस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति को सवालों के घेरे में लिया है कि यह मानवाधिकार उल्लंघन का मामला था, ट्रंप से इस पर सख्त रुख अपनाने की अपेक्षा की जाती थी। सैंडर्स के इस बयान के पीछे छिपी उनकी मंशा को समझना मुश्किल नहीं है।

अमेरिका में चुनाव की सरगर्मी है। पिछले दिनों भारतीय प्रधानमंत्री जब अमेरिका दौरे पर गए थे और वहां हाउडी मोदी कार्यक्रम में उन्होंने ट्रंप की खुल कर तारीफ की थी। उसके बाद से माना जाने लगा कि भारतीय प्रधानमंत्री के आह्वान से अमेरिका में रह रहे भारतीय मूल के लोगों पर असर पड़ेगा और वे ट्रंप को दुबारा राष्ट्रपति बनाने का निर्णय करेंगे। यह स्वाभाविक ही बर्नी सैंडर्स जैसे विपक्षी नेताओं को नागवार गुजरा होगा। फिर ट्रंप के भारत आगमन पर जिस तरह उनका अमदाबाद में भव्य स्वागत हुआ, उससे भी अमेरिका में रह रहे भारतीय मूल के लोगों पर असर पड़ने के कयास लगाए जाने लगे। इसे लेकर बर्नी सैंडर्स की चिढ़ रही होगी। इसलिए भी उन्होंने अमेरिका में रह रहे भारतीय मूल के लोगों का चित्त परिवर्तन करने की मंशा से उन्हें मानवाधिकार का मामला उठा कर घेरने की कोशिश की होगी। इसमें बर्नी को कितनी कामयाबी मिल पाएगी, देखने की बात है। मगर किसी देश के अंदरूनी मामले में दखल देकर उसका राजनीतिक लाभ उठाने की उनकी कोशिश को किसी भी रूप में उचित करार नहीं दिया जा सकता।

राष्ट्राध्यक्षों का मेजबान देशों द्वारा बढ़-चढ़ कर स्वागत किया जाना पूरी दुनिया में एक रिवाज है। इस लिहाज से अमेरिका में भारतीय प्रधानमंत्री का या फिर भारत में अमेरिकी राष्ट्रपति का भव्य स्वागत किसी को अखरने वाली बात नहीं होनी चाहिए। रही दिल्ली में हुई हिंसा की बात, तो वह भारत का अंदरूनी मामला है। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में यहां जगह-जगह धरने-प्रदर्शन हो रहे हैं। उन प्रदर्शनों के विरोध में कुछ लोग सामने आए और फिर उनके बीच हिंसक संघर्ष हो गया। इससे निपटने में कुछ देर जरूर हो गई, जिसे लेकर खुद भारत में आलोचनाएं हो रही हैं। इसकी जांच के आदेश दे दिए गए हैं। सरकार खुद इस मामले की समीक्षा कर रही है।

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार तक दंगाग्रस्त इलाकों का दौरा कर चुके हैं। फिर भी अगर कुछ विदेशी नेताओं को यह पर्याप्त नहीं लगता तो यह उनकी संकुचित दृष्टि ही कही जाएगी। किसी भी देश में हुई हिंसक घटनाओं को अपने राजनीतिक लाभ के लिए तोड़-मरोड़ कर पेश करने या फिर नाहक उस देश की छवि खराब करने की कोशिश अंतरराष्ट्रीय तकाजों के विरुद्ध कही जाएगी। किसी देश के विपक्षी नेता का किसी दूसरे देश की कानून-व्यवस्था के मामले में इस तरह दखल देना उचित नहीं।

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