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संपादकीयः तपेदिक की चुनौती

सरकार ने आठ साल के भीतर यानी सन 2025 तक भारत से तपेदिक (टीबी) का खात्मा कर देने का जो संकल्प किया है, वह अगर जमीन पर उतर सका तो भविष्य की पीढ़ियों के लिए वरदान साबित हो सकता है।

Author March 14, 2018 2:33 AM
पीएम मोदी

सरकार ने आठ साल के भीतर यानी सन 2025 तक भारत से तपेदिक (टीबी) का खात्मा कर देने का जो संकल्प किया है, वह अगर जमीन पर उतर सका तो भविष्य की पीढ़ियों के लिए वरदान साबित हो सकता है। यों इस मसले पर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है, लेकिन हर साल लाखों लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचाने के लिए जरूरी है कि तपेदिक के खात्मे की दिशा में सरकार अब संजीदगी से काम करे। देश से तपेदिक का नामोनिशान मिटाने के लिए प्रधानमंत्री ने रणनीतिक योजनाओं के अमल पर जोर दिया है, साथ ही राज्य सरकारों को भी हिदायत दी है कि इस अभियान को कामयाब बनाने में कोई कोताही नहीं बरती जाए। यह वाकई गंभीर बात है कि आजादी के सत्तर साल बाद भी भारत में तपेदिक जैसी बीमारी से हर साल लाखों लोग मर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने खुद माना कि तपेदिक पर रोक लगाने के लिए अब तक जो कुछ हुआ, उसमें कामयाबी हासिल नहीं हुई। यह नाकामी हमारी व्यवस्था में खामियों का नतीजा है, जिसकी वजह से आज भी आमजन तक स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं पहुंच पा रही हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि तपेदिक के खात्मे का अभियान कैसे कामयाब हो पाएगा?

दुनिया में तपेदिक के सबसे ज्यादा मरीज भारत में हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के एक चौथाई से ज्यादा तपेदिक मरीज भारत में हैं। यह आंकड़ा इसलिए भी चौंकाने वाला है कि चीन की आबादी भारत से ज्यादा है, फिर भी वहां तपेदिक के मरीजों की संख्या हमसे एक तिहाई कम है। 2015 में भारत में तपेदिक से तकरीबन पांच लाख लोगों की मौत हुई थी। इसी साल इस बीमारी के अट्ठाईस लाख नए मामले सामने आए। डब्ल्यूएचओ के सर्वे और आंकड़े के मुताबिक भारत में तपेदिक अनुमान से कहीं ज्यादा बड़ी महामारी है। ग्लोबल टीबी रिपोर्ट-2016 पर नजर डालें तो दुनिया में तपेदिक के जो एक करोड़ से ज्यादा मामले सामने आए, उनमें चौंसठ फीसद मामले भारत, पाकिस्तान, नाइजीरिया, फिलीपींस, इंडोनेशिया, चीन और दक्षिण अफ्रीका के थे और इनमें भारत शीर्ष पर था। मामला कुल मिला कर गंभीर और हैरान करने वाला इसलिए है कि हर साल इतनी बड़ी तादाद में लोगों के तपेदिक से मरने और लाखों नए मरीज सामने आने के बावजूद हम इस महामारी से निपट पाने में पूरी तरह अक्षम साबित हुए हैं।

तपेदिक कोई ऐसी लाइलाज बीमारी या महामारी नहीं है जिस पर काबू न पाया जा सके। पोलियो, चेचक जैसी महामारियों तक का सफाया हो सकता है तो फिर तपेदिक का क्यों नहीं? लेकिन बीमारी से भी बड़ी समस्या उस बीमार तंत्र और व्यवस्था से जुड़ी है, जिसे इस महामारी को मिटाना है। शहरों और महानगरों में कूड़े-कचरे के पहाड़ इस बीमारी को फैला रहे हैं। वायु प्रदूषण इस बीमारी के प्रमुख कारणों में एक है। आंकड़े तो अस्पतालों में दर्ज हो चुके मरीजों की तादाद बताते हैं, लेकिन इससे भी बड़ी तादाद उन मरीजों की है जो अस्पताल तक पहुंच ही नहीं पाते। भारत में एक और खतरनाक पहलू सामने आया है। अब ऐसे तपेदिक मरीजों की तादाद भी बढ़ रही है जो एचआइवी से ग्रस्त हैं। इसलिए ऐसे मरीजों तक पहुंच बनाने के लिए सरकारी मशीनरी को पहल करनी पड़ेगी। खासतौर से देश के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों के साथ शहरों की झुग्गी बस्तियों को निगरानी के दायरे में लाना होगा। अगर तपेदिक को मिटाने का संकल्प पूरा करना है तो पल्स पोलियो अभियान का आदर्श सामने रखना होगा और घर-घर जाकर लोगों को जागरूक करना होगा।

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