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संपादकीयः झोलाछाप और तंत्र

मरीजों को झोलाछाप डॉक्टर किस तरह मौत के मुंह में धकेल रहे हैं, इसका ताजा वाकया उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले की बांगरमऊ तहसील में सामने आया।

Author February 9, 2018 02:37 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

मरीजों को झोलाछाप डॉक्टर किस तरह मौत के मुंह में धकेल रहे हैं, इसका ताजा वाकया उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले की बांगरमऊ तहसील में सामने आया। एक तथाकथित डॉक्टर ने एक ही सूई से इंजेक्शन लगा कर कई लोगों को एचआइवी संक्रमित कर डाला। पिछले दस महीनों के दौरान पचास से ज्यादा लोग इसका शिकार हुए हैं। स्तब्ध कर देने वाली इस घटना का खुलासा तब हुआ जब प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग ने इलाके में शिविर लगा कर लोगों की जांच कराई। जब पता चला कि इनमें ज्यादातर मरीज एचआइवी ग्रस्त हो गए हैं और एक झोलाछाप के इंजेक्शनों से ऐसा हुआ है तो प्रशासन के होश उड़ गए। आनन-फानन में उसके खिलाफ रपट कराई गई और उसे पकड़ा गया। जो लोग इसके शिकार हुए, वे सब इतने गरीब हैं कि पैसा देकर इलाज कराना इनके बूते के बाहर है। यह झोलाछाप एक मरीज से सिर्फ दस रुपए लेता था इंजेक्शन लगाने के। वह कई सालों से एक छप्पर और कमरे में दवाखाना चला रहा था। लेकिन हैरान करने वाली बात तो यह है कि प्रशासन का कभी इस पर ध्यान नहीं गया।

झोलाछाप डॉक्टरों की ऐसी अनगिनत करतूतें सामने आती रही हैं। साधारण ब्लेड से मोतियाबिंद जैसे आॅपरेशन करने वालों ने तो न जाने कितनी आंखों की रोशनी छीन ली है! प्रसव के दौरान महिलाओं की मौत, अनाड़ीपन वाले इलाज से बच्चों की मौतें और भी न जाने क्या-क्या। ग्रामीण इलाकों में जो लोग प्राथमिक या सामुदायिक केंद्र तक भी नहीं पहुंच पाते हैं, उनकाइलाज ये झोलाछाप ही करते हैं। बांगरमऊ की घटना में जो तथाकथित डॉक्टर पकड़ा गया, वह पहले एक डॉक्टर के पास काम करता था और फिर अपना दवाखाना चलाने लगा। देश में ऐसे लाखों झोलाछाप डॉक्टर हैं जो बेखौफ अपना धंधा चला रहे हैं। कानून और प्रशासन का भय उन्हें क्यों नहीं है! दरअसल, ये झोलाछाप इस बदहाल तंत्र की ही देन हैं। आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित है। ग्रामीण इलाकों में हालात कैसे हैं, सरकारी आंकड़े ही इसकी तस्वीर पेश करने के लिए पर्याप्त हैं। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं का आलम यह है कि प्रदेश के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के अस्सी फीसद से ज्यादा पद खाली हैं। प्रदेश में मात्र 484 विशेषज्ञ काम कर रहे हैं, जबकि जरूरत 3288 की है। इनमें स्त्री रोग विशेषज्ञ, शल्य चिकित्सक और बाल रोग जैसे जरूरी विशेषज्ञ हैं।

तय मानक के मुताबिक पचास हजार की आबादी पर एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र होना चाहिए, लेकिन असलियत यह है कि एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर इससे कई गुना ज्यादा बोझ है। सवाल है कि ऐसे में ये सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र गरीबों को स्वास्थ्य संबंधी सेवाएं कैसे दे पाएंगे? उत्तर प्रदेश ही नहीं, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड जैसे राज्यों में भी स्वास्थ्य सेवाओं की हालत कमोबेश ऐसी ही है, जहां डॉक्टरों और आबादी का अनुपात भयावह तस्वीर पेश करता है। इसलिए गरीब आदमी झोलाछाप की शरण में जाने को मजबूर है। हमारे नीति-नियंताओं के सामने यह गंभीर सवाल है कि बीमार तंत्र को कैसे दुरुस्त करें ताकि हर अस्पताल में पर्याप्त डॉक्टर और जरूरी सुविधाएं हों और गरीब को झोलाछाप का मुंह नहीं ताकना पड़े। अगर प्रशासन चौकस रहता और और झोलाछापों पर सतत निगरानी रखता तो बांगरमऊ की त्रासदी न घटित होती।

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